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पराली कचरा नहीं, किसानों के लिए खजाना है; पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में आई भारी कमी : डॉ. श्योराण

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अबोहर, 16 अक्टूबर (आईएएनएस)। आईसीएआर-अटारी के निदेशक डॉ. परविंदर श्योराण ने कहा कि पराली कोई कचरा नहीं, बल्कि खजाना है, जिसे किसानों को अपने खेत में ही रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि किसानों के व्यवहार में बदलाव और प्रशासन व कृषि विभाग के संयुक्त प्रयासों से पराली जलाने की घटनाओं पर काफी हद तक काबू पाया गया है। 2018 में जहां पंजाब में 80 हजार से ज्यादा घटनाएं होती थीं, वहीं पिछले साल यह आंकड़ा घटकर 5100 रह गया है।

डॉ. परविंदर श्योराण ने कहा, “इस मेले में बड़ी संख्या में किसान भाई-बहन आए थे। हमने मंच के माध्यम से यह समझाने की कोशिश की है कि अभी धान की कटाई का सीजन चल रहा है और आगे गेहूं की बुवाई होगी तो ऐसे में हम पराली का प्रबंधन किस तरह कर सकते हैं और आग लगाने की घटनाओं को रोककर जीरो बर्निंग के लक्ष्य को कैसे हासिल कर सकते हैं।”

उन्होंने कहा, “इसी को लेकर पंजाब में हमने एक मंच साझा किया है, जहां किसानों की राय ली गई और वैज्ञानिकों ने अपनी सलाह दी। मेरा मानना है कि आने वाले समय में हम जीरो बर्निंग के लक्ष्य को हासिल कर लेंगे। हालांकि कई बार ऐसा भी होता है कि सैटेलाइट से पिछले रिकॉर्ड देखने पर पता चलता है कि कई बार किसी दूसरी वजह से लगी आग को भी सैटेलाइट कैप्चर कर लेता है, जिसे पराली जलाने की घटना में गिना जाता है।”

डॉ. परविंदर श्योराण ने कहा, “अगर आप पिछले साल के आंकड़ों को देखें तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि जब 2018 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ था, तब पराली जलाने की एक लाख से ज्यादा घटनाएं होती थीं। उसमें पंजाब की हिस्सेदारी लगभग 70-80 फीसदी थी और अकेले पंजाब में ही 80 हजार से ज्यादा जगहों पर आग लगाई जाती थी।”

उन्होंने कहा कि समय के साथ इसमें सभी ने बहुत योगदान दिया, चाहे वह प्रशासन हो, कृषि विभाग हो या कृषि विज्ञान केंद्र हों, लेकिन सबसे अहम भूमिका किसान भाइयों की रही है। पिछले साल का आंकड़ा लगभग 5100 तक रह गया था। कुल मिलाकर जो घटनाएं एक लाख से ज्यादा थीं, वह पिछले साल घटकर 36 हजार रह गईं और उसमें पंजाब का योगदान सिर्फ 15 फीसदी ही था।

उन्होंने कहा कि यह सभी के एकजुट होकर काम करने का नतीजा है कि इस पर काफी हद तक काबू पाया गया है। आगे हमारी यही योजना रहेगी कि हम इसे पूरी तरह से शून्य कैसे कर सकते हैं। यह हम सबका सपना है और उम्मीद है कि यह सपना जरूर पूरा होगा।

डॉ. परविंदर ने कहा, “चाहे इसके लिए कोई भी तरीका हो, आप पराली को जमीन में कैसे मिला सकते हैं। अगर तकनीक की बात की जाए तो अब सारी तकनीकें किसानों के पास मौजूद हैं। आप पराली को जमीन के ऊपर भी रख सकते हैं और जमीन के अंदर भी मिला सकते हैं। यह किसानों की पसंद होगी कि उन्हें कौन सी तकनीक सूट करती है और वे किसे अपनाना चाहते हैं। तकनीक की कोई कमी नहीं है और किसानों का व्यवहार भी बदल रहा है। सबसे महत्वपूर्ण व्यवहार में बदलाव है और काफी हद तक किसानों ने अपने व्यवहार में यह बदलाव अपना लिया है।”