राज्यसभा में की गई सभी के लिए समान नियमों की मांग, कहा- धार्मिक शिक्षा के नियम में है असंतुलन

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नई दिल्ली, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। राज्यसभा में बुधवार को धार्मिक शिक्षा का विषय उठाया गया। भारतीय जनता पार्टी के राज्य सभा सांसद दिनेश शर्मा ने यह विषय सदन के समक्ष रखा।

उन्होंने सदन में कहा कि धार्मिक शिक्षा के संदर्भ में भी असंतुलन देखा जाता है। जहां सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे कुरान और मिशनरी संस्थान बाइबल की शिक्षा दे सकते हैं, वहीं हिन्दू संचालित संस्थानों को वेद, उपनिषद या गीता के शिक्षण में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बाधाओं का सामना करना पड़ता है। अक्सर यह कहा जाता है कि सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाले संस्थान ऐसा नहीं कर सकते।

दिनेश शर्मा ने कहा कि वह धार्मिक शिक्षा के एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान की धारा 14 समानता का वादा करती है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में अनुच्छेद 29 और 30 के कारण व्यावहारिक असमानता उत्पन्न होती दिखाई देती है।

आज संवैधानिक व्यवस्था अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 30 (1) के तहत अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और धार्मिक शिक्षा देने की पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करती है। इसमें किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है। किन्तु, हिन्दू समाज को इसी प्रकार के मौलिक अधिकारों से व्यावहारिक रूप से वंचित रखा जाना चिंता का विषय है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के अंतर्गत अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट प्राप्त है, जबकि अन्य विद्यालयों पर प्रशासनिक और आर्थिक दायित्व लागू होते हैं।

इसी असमानता के कारण 1980 के दशक में रामकृष्ण मिशन ने पश्चिम बंगाल में अपने संस्थानों को सरकारी हस्तक्षेप से बचाने के लिए अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त करने का प्रयास किया था। हालांकि, 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि वे हिन्दू धर्म का ही एक हिस्सा हैं और अनुच्छेद 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यक नहीं माने जा सकते। ऐसे ही उदाहरण आर्य समाज द्वारा संचालित डीएवी संस्थानों तथा कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के प्रयासों में भी देखे गए, जहां उन्होंने अपने संस्थानों को सरकारी हस्तक्षेप से बचाने के लिए स्वयं को अलग या अल्पसंख्यक घोषित करने का प्रयास किया, जो सफल नहीं हो सका।

दिनेश शर्मा ने कहा कि उनके वक्तव्य का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय को दिए गए अधिकारों का विरोध करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि समान अधिकार सभी को प्राप्त हों। समय की मांग है कि “एक देश, एक विधान” की भावना के अनुरूप शिक्षा के क्षेत्र में संस्थागत स्वायत्तता सभी के लिए सुनिश्चित की जाए। अनुच्छेद 29 और 30 में आवश्यक संशोधन कर ‘अल्पसंख्यक’ शब्द के स्थान पर सभी नागरिकों को समान रूप से शामिल किया जाए। धार्मिक शिक्षा प्रत्येक भारतीय का समान अधिकार होना चाहिए।

शिक्षा के क्षेत्र में समानता, न्याय और संतुलन सुनिश्चित किया जाए, ताकि संविधान की मूल भावना सुरक्षित रह सके। यही सच्चे अर्थों में न्याय है, यही संविधान की आत्मा है और यही राष्ट्र के समावेशी विकास का मार्ग है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, और यह हम सभी के लिए गर्व का विषय है। धर्म के आधार पर भेदभाव और असमानता स्वीकार्य नहीं हो सकती। भाजपा सांसद ने कहा कि वह इस विषय पर गंभीर और चिंतनशील पहल करने की मांग करते हैं।

–आईएएनएस

जीसीबी/एएस