नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 16 और 17 अगस्त को तमिलनाडु के दो दिवसीय दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वे चेन्नई, चेंगलपट्टू, तिरुवरूर और तंजावुर में कई शैक्षणिक, यादगार और साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल होंगे।
16 अगस्त को अपनी यात्रा के दौरान उपराष्ट्रपति चेंगलपट्टू के कट्टनकुलथुर में एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के 22वें दीक्षांत समारोह में शामिल होंगे। वे चेन्नई के टी. नगर स्थित वाणी महल में नागालैंड, मणिपुर और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल ला. गणेशन की पहली पुण्यतिथि के कार्यक्रम में भी शामिल होंगे।
इसके बाद सी. पी. राधाकृष्णन चेन्नई के डी.जी. वैष्णव कॉलेज ऑडिटोरियम में ‘इकोज ऑफ ए नेशनलिस्ट माइंड’ किताब के विमोचन कार्यक्रम में शामिल होंगे। यह किताब हिंदू मुन्नानी के संस्थापक स्वर्गीय के. रामागोपालन के विचारों और लेखों पर आधारित है।
17 अगस्त को उपराष्ट्रपति तिरुवरूर में तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय के 11वें दीक्षांत समारोह में शामिल होंगे। इसके बाद वे तंजावुर में शास्त्र डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूबी और सिल्वर जुबली समापन समारोह में भाग लेंगे।
इससे पहले, हर घर तिरंगा अभियान के तहत बुधवार को भारत मंडपम में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे। उपराष्ट्रपति ने हरी झंडी दिखाकर बाइक रैली को भी रवाना किया था।
इस दौरान उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा था, “हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के 150वें साल का जश्न मनाते हुए मैं गहरी भावनाओं से भर गया हूं। ‘वंदे मातरम’ शब्दों ने भारतीयों के दिलों में देशभक्ति की भावना जगाई और हमारी मातृभूमि से औपनिवेशिक शासन को खत्म करने के संघर्ष में एक बड़ी ताकत बने।”
उन्होंने कहा था, “हमारा स्वतंत्रता संग्राम भारतीय मन, आत्मा और चेतना की जागृति थी। इसने आजादी के एक साझे सपने के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों, भाषाओं, धर्मों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोगों को एकजुट किया।”
सीपी राधाकृष्णन ने कहा था, “हमारे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के लिए, यह गीत सिर्फ कुछ शब्द नहीं थे। यह हिम्मत, त्याग और उम्मीद का स्रोत था। कई लोग दिल में ‘वंदे मातरम’ लिए और हर समय ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाते हुए फांसी के फंदे तक गए। सांसद के तौर पर हमें अपने राष्ट्रीय गीत की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर एक खास चर्चा में शामिल होने का सौभाग्य मिला। मुझे खुशी है कि यह राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी के तौर पर मेरे पहले सत्र के दौरान हुआ। संसद में यह चर्चा 12 घंटे से ज्यादा समय तक चली और यह इस सत्र की सबसे दिलचस्प और सार्थक चर्चाओं में से एक थी।”

