राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस : पोखरण की तपती रेत से लेकर एआई तक… भारत ने हासिल की जादुई तकनीकी उड़ान

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नई दिल्ली, 10 मई (आईएएनएस)। यह बात ​11 मई 1998 की है। आसमान से अमेरिकी खुफिया सैटेलाइट्स भारत के चप्पे-चप्पे पर अपनी पैनी नजरें गड़ाए हुए थे। उन्हें चकमा देना नामुमकिन सा लग रहा था। लेकिन, फिर भी, वे धोखा खा गए। अचानक जमीन कांपी और दुनिया भर के सिस्मोग्राफ ने एक ऐसी हलचल दर्ज की, जिसने भारत का भू-राजनीतिक इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया।

​यह भारत का सफल भूमिगत परमाणु परीक्षण ‘ऑपरेशन शक्ति’ था। उसी दिन हमारे वैज्ञानिकों ने आसमान में स्वदेशी विमान ‘हंसा-3’ को सफलतापूर्वक उड़ाकर और अचूक ‘त्रिशूल’ मिसाइल का परीक्षण करके सबको हैरत में डाल दिया। भारत ने एक ही दिन में परमाणु, उड्डयन, और रक्षा क्षेत्र में अपना लोहा मनवा लिया था। हमारी इस अदम्य वैज्ञानिक इच्छाशक्ति को सलाम करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 11 मई को ‘राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस’ घोषित किया।

​आज तकनीक ‘कल्याण’ का दूसरा नाम बन गई है। किसी सुदूर गांव का किसान आज ‘ई-चौपाल’ के जरिए अपने फोन पर अपनी फसल का सही दाम और मौसम की सटीक जानकारी ले रहा है। ‘स्टेम ऑन व्हील्स’ जैसी शानदार पहलों ने मोबाइल क्लीनिक को सीधे गांवों में पहुंचा दिया है, जहां बैठा एक गरीब मरीज शहरों के बड़े डॉक्टरों से वीडियो कॉल पर अपना इलाज करवा रहा है। आंगनवाड़ी में काम करने वाली महिलाएं ‘पोषण ट्रैकर’ ऐप से बच्चों को कुपोषण से बचा रही हैं। ये है असली भारत की असली तकनीकी क्रांति, जहां इनोवेशन जमीनी हकीकत को बदल रहा है।

​अगर आप जानना चाहते हैं कि आज दुनिया भारत को किस नजर से देखती है, तो फरवरी 2026 में नई दिल्ली के भारत मंडपम में हुए ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ को याद कीजिए। 15 से ज्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और 70 हजार से अधिक लोगों का हुजूम इस बात का गवाह बना कि अब भारत तकनीक के मामले में दुनिया के पीछे नहीं चलता, बल्कि दुनिया को रास्ता दिखाता है।

​ये सब कोई जादू नहीं है। इसके पीछे उन गुमनाम वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, युवा छात्रों और स्टार्टअप्स की सालों की तपस्या है, जो लैब के बंद कमरों में देश का कल लिख रहे हैं। इन प्रतिभाओं को पंख देने का काम भारत सरकार का ‘प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड’ (टीडीबी) करता है।

​हर साल इसी दिन टीडीबी ऐसे स्टार्टअप्स और एमएसएमई को ‘राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी पुरस्कार’ और ‘राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार’ से नवाजता है, जिन्होंने कागजी रिसर्च को असली बाजार में उतारा हो। चाहे वो ‘रोटावैक’ जैसी सस्ती स्वदेशी वैक्सीन बनाने वाली कंपनी हो या फिर ग्रामीण शिक्षा को बदलने वाले एडटेक स्टार्टअप्स।

सरकार इन इन्नोवेटर्स को लाखों-करोड़ों की वित्तीय मदद देकर उनके सपनों को उड़ान दे रही है। इसके साथ ही दिल्ली यूनिवर्सिटी से लेकर शारदा यूनिवर्सिटी तक, हर जगह छात्रों के लिए ‘हैकथॉन’ और ‘रोबो रेस’ हो रहे हैं, ताकि नई पीढ़ी के दिमाग को इनोवेशन के लिए तैयार किया जा सके।

​आज जब हम 2026 के आगे देखते हैं, तो हमारी नजरें डीप-टेक, क्वांटम मिशन और खुद का सेमीकंडक्टर हब बनाने पर टिकी हैं। आज भारत पेटेंट फाइल करने में दुनिया के शीर्ष देशों को टक्कर दे रहा है।

11 मई का दिन हमें बस एक ही बात याद दिलाता है। 1998 में हमने दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराया था, और आज 2026 में हम दुनिया को एक सुरक्षित और समावेशी भविष्य का रास्ता दिखा रहे हैं।