Tuesday, August 11, 2026
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‘वदे मातरम’ का इस्तेमाल सांप्रदायिकता फैलाने के लिए कर रही भाजपा और आरएसएस : सांसद वी. शिवदासन

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नई दिल्ली, 11 अगस्त (आईएएनएस)। सीपीआई (एम) सांसद वी. शिवदासन ने आरोप लगाया है कि आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी ‘वंदे मातरम’ गीत का इस्तेमाल समाज में सांप्रदायिकता फैलाने के लिए कर रही है।

15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से पहली बार ‘वंदे मातरम’ गाए जाने पर सीपीआई (एम) सांसद वी. शिवदासन ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि ‘वंदे मातरम’ हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का अहम हिस्सा है। हम सभी ‘वंदे मातरम’ का बहुत सम्मान करते हैं, लेकिन आरएसएस और भाजपा इस महान गीत का इस्तेमाल हमारे समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोलने के लिए कर रहे हैं। इसलिए इसका विरोध किया जाना चाहिए।”

इसके पहले सांसद ने कहा था, “हम वंदे मातरम का सम्मान करते हैं और पहले हुए समझौते के अनुसार संविधान सभा ने भी वंदे मातरम और जन गण मन पर चर्चा की थी। आखिरकार यह मामला सुलझा लिया गया था। इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ने वालों और राष्ट्रीय आंदोलन के महान नेताओं ने यह फैसला किया था कि वंदे मातरम का पूरा वर्जन गाने की कोई जरूरत नहीं है।”

सांसद वी. शिवदासन ने कहा, “दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शन के बारे में किरेन रिजिजू ने कहा है कि अमित शाह चर्चा के दौरान जवाब देंगे या बयान देंगे। इसलिए मुझे नहीं पता कि उनकी क्या योजना है, क्या यह सिर्फ एक बयान होगा या बयान के बाद चर्चा और जवाब भी होगा। इस बारे में स्पष्टता जरूरी है।”

सांसद ने कहा, “तमिलनाडु, केरल और कुछ अन्य राज्यों ने नीट परीक्षा को लेकर अपनी आपत्तियां बहुत पहले ही साफ कर दी थीं। कई संगठनों ने भी अलग-अलग मंचों पर अपनी आपत्तियां उठाईं। इसलिए, नीट असल में संघीय ढांचे के हितों के खिलाफ है। इसे खत्म कर दिया जाना चाहिए और राज्य-स्तरीय परीक्षाएं राज्य सरकारों या संबंधित एजेंसियों द्वारा आयोजित की जानी चाहिए। यहां केंद्र सरकार पूरी व्यवस्था को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है और इसका विरोध किया जाना चाहिए।”

महिला आरक्षण और परिसीमन बिलों पर सांसद वी. शिवदासन ने मंगलवार को कहा था, “सरकार का एजेंडा देश की आम जनता को मंजूर नहीं है। परिसीमन और महिला आरक्षण हमारे समाज में सबसे ज्यादा चर्चा वाले विषयों में से हैं। इसका असर उन राज्यों पर पड़ेगा, जिन्होंने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत अच्छा काम किया है। आरएसएस और भाजपा की यह परिसीमन नीति संसद में दक्षिण भारतीय राज्यों की हिस्सेदारी को कम कर देगी।”