नई दिल्ली, 29 जून (आईएएनएस)। राज्यसभा सदस्य डॉ. जॉन ब्रिटास ने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को पत्र लिखकर वरिष्ठ पत्रकार राजगोपाल रामदास के पासपोर्ट नवीनीकरण (रिन्यूअल) से इनकार के मामले में तत्काल व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटना, पासपोर्ट रिन्यूअल रोकने का स्वत: आधार नहीं हो सकता।
डॉ. ब्रिटास ने विदेश मंत्री को भेजे गए विस्तृत ज्ञापन में कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की परेशानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पासपोर्ट अधिनियम, 1967, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विदेश यात्रा के अधिकार और नागरिकता और चुनाव संबंधी कानूनों के बीच संबंधों से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाता है।
उन्होंने अपने पत्र में सवाल उठाया कि क्या मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हट जाना, खासकर तब जब वह मामला कानूनी चुनौती के अधीन हो, पासपोर्ट नवीनीकरण से इनकार करने का वैध आधार बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि संसद ने मतदाता सूची से नाम हटने को पासपोर्ट अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति की अयोग्यता के रूप में मान्यता नहीं दी है।
सांसद ने यह भी पूछा कि क्या एक वैधानिक प्राधिकरण दूसरे कानून के तहत किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा लिए गए फैसले को आधार बनाकर अपने अधिकार क्षेत्र में निर्णय ले सकता है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग कानूनों के तहत काम करने वाली संस्थाओं के अधिकारों और प्रक्रियाओं को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
ज्ञापन में बताया गया है कि राजगोपाल रामदास को वर्ष 2005 में भारतीय पासपोर्ट जारी किया गया था और सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं के बाद वर्ष 2015 में उसका नवीनीकरण भी किया गया था। डॉ. ब्रिटास ने सवाल उठाया कि केवल मतदाता सूची से नाम हटने के आधार पर पासपोर्ट रिन्यूअल से इनकार करना क्या मंत्रालय के अपने पहले के निर्णयों पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़ा नहीं करता?
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सतवंत सिंह साहनी और मेनका गांधी के मामलों के ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि पासपोर्ट जारी करने या रोकने की शक्ति का इस्तेमाल केवल पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के तहत ही किया जा सकता है। साथ ही, ऐसे निर्णय संविधान में निहित निष्पक्षता, तर्कसंगतता और उचित प्रक्रिया के सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए।
डॉ. ब्रिटास ने विदेश मंत्रालय से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नाम हटना या उससे जुड़ी कार्यवाही लंबित होना, अपने आप में पासपोर्ट रिन्यूअल रोकने का कानूनी आधार नहीं माना जाए।
उन्होंने कहा कि यह मामला भारत सरकार द्वारा जारी आधिकारिक दस्तावेजों की विश्वसनीयता और नागरिकों के भरोसे से जुड़ा है। उन्होंने मंत्रालय से आग्रह किया कि मामले की समीक्षा पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के अनुसार की जाए और किसी अन्य कानूनी व्यवस्था के तहत दर्ज प्रशासनिक निष्कर्षों को स्वतंत्र कानूनी जांच के स्थान पर आधार न बनाया जाए।

