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‘समान नियम’ का मतलब ‘एक जैसे नियम’ नहीं, भारत की विधायी विविधता का सम्मान जरूरी: विजेंद्र गुप्ता

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नई दिल्ली, 27 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने भारत में विधायी निकायों की कार्यप्रणाली और संचालन में एकरूपता लाने के लिए आदर्श नियमों के निर्माण हेतु गठित समिति की बैठक में दिल्ली की सिफारिशें प्रस्तुत करते हुए कहा कि समान नियमों का अर्थ एक जैसे नियम नहीं होना चाहिए। हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि प्रत्येक विधानमंडल की संवैधानिक स्वायत्तता और संस्थागत विशिष्टता को संरक्षित रखते हुए समान लोकतांत्रिक मानकों को सुदृढ़ किया जाए। व्यापक संसदीय सुधारों का आह्वान करते हुए उन्होंने लिंग-तटस्थ विधायी नियमों की आवश्यकता पर बल दिया और तर्क दिया कि सामान्य खंड अधिनियम, 1897 से व्युत्पन्न परंपराओं के तहत बरकरार रखे गए पुरुषवादी भावों को समकालीन लोकतांत्रिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने वाली भाषा के लिए स्थान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि नारी शक्ति की मान्यता भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों को नियंत्रित करने वाले नियमों तक विस्तारित होनी चाहिए।

बैठक की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना ने की, और इसमें महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष राहुल नार्वेकर भी उपस्थित थे। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया और कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष जीएस पाटिल, वरिष्ठ विधायी अधिकारियों और प्रतिनिधियों के साथ उपस्थित थे। पीठासीन अधिकारियों का स्वागत करते हुए गुप्ता ने पटना में आयोजित 85वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में लिए गए एक समान प्रक्रियात्मक ढांचा विकसित करने के निर्णय के बाद, 12 मई 2026 को मैसूर में हुई समिति की प्रारंभिक बैठक का स्मरण किया। मसौदा रिपोर्ट तैयार करने के लिए उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय की सराहना करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस प्रक्रिया में अस्पष्टताओं की पहचान की जानी चाहिए, प्रभावी संसदीय प्रथाओं का उपयोग किया जाना चाहिए, और ठोस संस्थागत सुधार किए जाने चाहिए।

पूरी बैठक कागजी कार्रवाई के बिना संपन्न हुई, जो विधायी संस्थानों में डिजिटल प्रक्रियाओं के बढ़ते उपयोग को दर्शाती है। दिल्ली विधानसभा सचिवालय द्वारा किए गए पर्यावरण प्रभाव आकलन के अनुसार, 1,521 पृष्ठों वाले 12 सेट दस्तावेजों के डिजिटल वितरण से अनुमानित 18,252 कागज की शीटों की बचत हुई, जो लगभग 4.4 पेड़ों और 18,252 लीटर पानी के बराबर है, साथ ही अनुमानित 182.5 किलोग्राम सीओ टू-समकक्ष उत्सर्जन में कमी आई है।

संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर जोर देते हुए विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि आदर्श नियमों में दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर के विशिष्ट कानूनी ढांचों को मान्यता दी जानी चाहिए, जिनकी विधानसभाएं संवैधानिक प्रावधानों और विशिष्ट कानूनों के तहत कार्य करती हैं। इनमें दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम, 1991 भी शामिल है। उन्होंने द्विसदनीय विधानसभाओं (विधान परिषदें, उनके पीठासीन अधिकारी, सचिवालय के अधिकारी और पारस्परिक व्यवस्थाएं शामिल) के लिए उचित प्रावधानों की मांग की। उन्होंने अध्यक्ष पदों के चुनाव, अध्यक्षों के पैनल के नामांकन और अध्यक्ष के कार्यों के प्रत्यायोजन पर स्पष्टता की भी सिफारिश की। उन्होंने चेतावनी दी कि कोरम की आवश्यकताओं को केवल कानून बनाकर ही बदला जा सकता है और राष्ट्रपति, राज्यपाल और उपराज्यपाल के संबोधनों से संबंधित प्रावधानों सहित संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के अनावश्यक दोहराव का विरोध किया।

विधायी कार्यप्रणाली के संबंध में विजेंद्र गुप्ता ने तीन वार्षिक सत्रों (बजट, मानसून और शीतकालीन) और सभी राज्य विधानसभाओं के लिए कम से कम 30 बैठकों का समर्थन किया। डिजिटल संसद, ई-विधान और राष्ट्रीय ई-विधान एप्लिकेशन (नेवा) के बढ़ते उपयोग के साथ, उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक नोटिस, समन, याचिकाएं और प्रक्रियात्मक संचार को औपचारिक मान्यता देने की वकालत की। उन्होंने दैनिक उपस्थिति रजिस्टर से सदस्यों की सूची को अलग करने और प्रभावी मौजूदा संसदीय व्यवस्थाओं को बनाए रखने का भी आह्वान किया। सत्र की शुरुआत में वंदे मातरम और सत्र के समापन पर जन गण मन को मान्यता देने के प्रस्ताव का स्वागत करते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि दिल्ली विधानसभा में इन दोनों प्रथाओं का पालन किया जाता है।

प्रक्रियात्मक लचीलेपन को बढ़ावा देने के लिए विजेंद्र गुप्ता ने शून्यकाल और विशेष उल्लेखों के बीच दोहराव से बचने, स्थगन प्रस्तावों को प्रति सत्र एक तक सीमित करने और बहस की अवधि को अध्यक्ष या सदन के विवेक पर छोड़ने की सिफारिश की। उन्होंने स्थगित सदन को पुनः बुलाने से पहले प्रस्तावित अनिवार्य पांच दिवसीय अंतराल पर भी सवाल उठाया। संसदीय सुधार के केंद्र में विधायी जांच को रखते हुए उन्होंने आग्रह किया कि विधेयकों के साथ वित्तीय, प्रशासनिक और कानूनी जानकारी, जिसमें वित्तीय ज्ञापन और प्रत्यायोजित विधायी शक्तियों का विवरण शामिल हो, संलग्न की जानी चाहिए। उन्होंने विधेयकों के अग्रिम इलेक्ट्रॉनिक वितरण और अधिकृत अनुवादों का समर्थन किया और जहां उपयुक्त हो, उन्हें विशेषज्ञ परामर्श और सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए चयन समितियों या विभाग से संबंधित स्थायी समितियों को भेजने का भी समर्थन किया।

विजेंद्र गुप्ता ने आगे इस बात पर जोर दिया कि दिल्ली को कानून के प्रामाणिक अंग्रेजी पाठ की अपनी वैधानिक आवश्यकता को बनाए रखना चाहिए और तत्काल प्रक्रियात्मक छूटों को ठीक से दर्ज करना चाहिए। अधिक सार्वजनिक भागीदारी की वकालत करते हुए उन्होंने याचिका प्रपत्रों से पुराने औपनिवेशिक शब्दों को हटाने, क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता देने और प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक प्रस्तुतियों की अनुमति देने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने दिल्ली में निजी सदस्यों द्वारा अग्रिम स्वीकृति जांच हेतु पूर्ण प्रस्तावों को नोटिस सहित प्रस्तुत करने की प्रथा पर भी प्रकाश डाला। सचिव द्वारा विधेयकों के असाधारण प्रमाणीकरण का समर्थन करते हुए, जो कानूनी सुरक्षा उपायों के अधीन है, उन्होंने प्रमाणीकरण और स्वीकृति के बीच अंतर पर बल दिया। उन्होंने आगे कहा कि वित्तीय मामलों, संवैधानिक संशोधनों और अधीनस्थ विधानों से संबंधित प्रावधानों में प्रत्येक विधानमंडल की संवैधानिक क्षमता का प्रतिबिंब होना चाहिए।