नई दिल्ली, 6 मई (आईएएनएस)। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को भारत की सीमाओं पर विकास और सुरक्षा की एक बहुत ही मजबूत कड़ी माना जाता है। यह संगठन सिर्फ सड़कें बनाने वाली कोई आम एजेंसी नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों से सीधे जुड़ा हुआ एक अहम संगठन है। हर साल 7 मई को इसका स्थापना दिवस मनाया जाता है क्योंकि इसकी शुरुआत 7 मई 1960 को हुई थी। आज के समय में यह संगठन भारत के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण इलाकों में काम करने के लिए जाना जाता है, जहां सामान्य निर्माण कार्य करना लगभग असंभव माना जाता है।
बीआरओ का मुख्य काम सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क, पुल और सुरंगें बनाना और उनका रखरखाव करना है। खास बात यह है कि यह काम ऐसे इलाकों में होता है जहां मौसम बेहद खराब रहता है, जैसे ऊंचे पहाड़, बर्फ से ढके क्षेत्र और दुर्गम घाटियां। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और हिमाचल जैसे राज्यों में बीआरओ की मौजूदगी साफ दिखाई देती है। इन इलाकों में सड़कें सिर्फ आम लोगों की सुविधा के लिए नहीं बल्कि सेना की आवाजाही और देश की सुरक्षा के लिए भी बेहद जरूरी होती हैं।
बीआरओ की स्थापना के समय इसके पास सिर्फ दो प्रोजेक्ट थे: पूर्व में प्रोजेक्ट टस्कर (अब वर्तक) और उत्तर में प्रोजेक्ट बीकन लेकिन आज यह संगठन देश के कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में फैला हुआ है। अब इसके तहत कई बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं और यह संगठन आधुनिक तकनीक और नई इंजीनियरिंग के साथ लगातार आगे बढ़ रहा है। शुरुआती दौर में इसका काम सीमित था लेकिन आज यह संगठन हजारों किलोमीटर लंबी सड़कों और सैकड़ों पुलों का निर्माण कर चुका है।
अगर इसके काम की बात करें तो बीआरओ ने अब तक भारत और कुछ मित्र देशों में मिलाकर हजारों किलोमीटर सड़कें बनाई हैं। इसके अलावा सैकड़ों पुल और कई सुरंगें भी तैयार की गई हैं, जो मुश्किल इलाकों में कनेक्टिविटी को आसान बनाती हैं। खासकर पहाड़ी इलाकों में जहां सामान्य सड़क बनाना बेहद कठिन होता है, वहां बीआरओ ने असंभव को संभव करके दिखाया है। ऊंचाई वाले इलाकों में 9,000 फीट से लेकर 19,000 फीट तक की ऊंचाई पर सड़क निर्माण करना इसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है।
हाल के वर्षों में बीआरओ ने कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पूरे किए हैं। इसमें सेला सुरंग जैसे बड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं, जिसने अरुणाचल प्रदेश में कनेक्टिविटी को और बेहतर बनाया है। इसी तरह भविष्य में शिंकुन ला सुरंग जैसी परियोजना पर भी काम हो रहा है, जो दुनिया की सबसे ऊंची सुरंगों में से एक बनने वाली है। इन परियोजनाओं से सेना को सीमाओं तक तेजी से पहुंचने में मदद मिलती है।
बीआरओ का काम सिर्फ सड़क और पुल बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह संगठन देश की रणनीतिक जरूरतों को भी पूरा करता है। सीमावर्ती इलाकों में मजबूत सड़क नेटवर्क होने से सेना को किसी भी स्थिति में तेजी से मूवमेंट करने में मदद मिलती है। यही वजह है कि बीआरओ को देश की सुरक्षा व्यवस्था का एक अहम हिस्सा माना जाता है।
इसके अलावा, बीआरओ ने हवाई पट्टियों और अन्य रणनीतिक ढांचों के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई है। बागडोगरा और बैरकपुर जैसे एयरफील्ड इसका उदाहरण हैं, जो देश की रक्षा और आपात स्थिति में बेहद महत्वपूर्ण साबित होते हैं। इसके साथ ही कई नई परियोजनाएं भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं, जिससे आने वाले समय में सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी और बेहतर होगी।
यह संगठन महिलाओं की भागीदारी को भी बढ़ावा दे रहा है। पहले जहां इस तरह के कठिन कामों में महिलाओं की भागीदारी कम थी, वहीं अब कई महिला इंजीनियर और अधिकारी बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व कर रही हैं।

