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स्मृति शेष : हिंदी साहित्य की प्रमुख कवयित्रियों में से एक महादेवी वर्मा, जो कहलाईं ‘आधुनिक युग की मीरा’

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नई दिल्ली, 10 सितंबर (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य और हिंदी कवयित्रियों की जब भी बात होगी, छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक महादेवी वर्मा का नाम जरूर लिया जाएगा, जिन्हें ‘आधुनिक युग की मीरा’ भी कहा जाता है। वह देश की उन चुनिंदा कवयित्रियों में से एक रहीं, जिन्होंने देश को आजादी से पहले और आजादी के बाद दोनों स्थितियों में देखा।

आधुनिक हिंदी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में शामिल महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहां पिछले 200 वर्षों और लगभग 7 पीढ़ियों से बेटी का जन्म नहीं हुआ था, इसलिए उनके जन्म के बाद परिवार ने इनको देवी का रूप मानते हुए महादेवी नाम दिया।

उनके पिता का नाम गोविंद प्रसाद वर्मा था, जो कि भागलपुर के एक कॉलेज में प्रोफेसर थे और मां का नाम हेमरानी देवी था, जो एक धार्मिक प्रवृत्ति वाली महिला थीं। महादेवी ने अपनी शैक्षणिक सफर की शुरुआत इंदौर के एक स्कूल से की। इसी के साथ उन्हें घर पर अलग-अलग शिक्षकों द्वारा संस्कृत, अंग्रेजी, संगीत और चित्रकला की शिक्षा दी जाती थी। हालांकि, शादी हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही अधूरी रह गई।

उनके पिता ने वर्ष 2016 में उनकी शादी स्वरूप नारायण वर्मा से कर दी, जो कि खुद उस समय 10वीं कक्षा के छात्र थे। शादी के बाद दोनों पति-पत्नी अपनी आगे की पढ़ाई के लिए अलग-अलग हॉस्टल में रहने लगे। वर्ष 1921 में महादेवी ने 8वीं कक्षा की परीक्षा पास करने के साथ प्रांत भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

उन्हें छोटी उम्र से ही कला में रुचि थी। वह महज 7 वर्ष की आयु से कविता लिखने लगी थीं और 1925 तक, जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की, वे एक सफल कवयित्री के रूप में उभरने लगीं। उस दौरान उनकी कविताएं विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। वर्ष 1932 में महादेवी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एमए की परीक्षा पास की। हालांकि, उस समय तक उनकी दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुकी थीं।

महादेवी वर्मा सिर्फ कवयित्री ही नहीं थीं। वह एक मजबूत व्यक्तित्व भी थीं। उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति पर खुलकर लिखा और अपनी लेखनी के जरिए उनकी आवाज बनीं। वह उस दौर की महिला थीं, जहां महिलाओं के लिए अपना मुकाम बनाना बिल्कुल भी आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने काबिलियत के बलबूते अपनी राह खुद बनाई। इसी के साथ उन्होंने महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने में भी अहम भूमिका निभाई।

वह साहित्य की उन कवयित्रियों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी कविताओं की रचना ऐसे शब्दों और भावों से की, जिसे पढ़कर पाठक को ऐसा प्रतीत होता है कि कोई अपनी कहानी कह रहा है। उनकी रचनाओं में जो दर्द, विरह और आध्यात्मिक प्रेम है, वह सीधे पाठक के दिल को छूता है।

उनकी रचनाओं में इंसान ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति भी गहरा प्रेम देखने को मिलता है। उनकी कुछ प्रमुख रचनाओं की बात करें तो उनमें ‘यामा’, ‘नीरजा’, ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएं’, ‘निहार’, ‘सांध्यगीत’, ‘दीपशिखा’, ‘यामा’, ‘स्मृति की रेखाएं’, ‘श्रृंखला की कड़ियां’, ‘मेरा परिवार’, आदि शामिल हैं।

महादेवी के जीवन की सबसे बड़ी हकीकत रही कि उन्होंने शुरू से ही अपना जीवन एक संन्यासिनी के तौर पर बिताया। विवाहित होने के बावजूद उन्होंने जीवन भर श्वेत वस्त्र पहना और सौंदर्य एवं श्रृंगार से दूर रहीं। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने कभी शीशा नहीं देखा और तख्त पर सोईं।

उन्हें साहित्यिक योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे बड़े सम्मान मिले। वहीं, 11 सितंबर 1987 को हिंदी साहित्य की दुनिया में एक ऐसा दिन आया जब ‘आधुनिक युग की मीरा’ हमेशा के लिए विदा हो गईं।