Thursday, July 2, 2026
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नर्मदा : 1,000 आदिवासी परिवार स्वच्छ ऊर्जा पर निर्भर, 665 घरों में बायोगैस प्लांट चालू

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नर्मदा, 15 मई (आईएएनएस)। गुजरात के एकता नगर स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निकट रहने वाले एक हजार आदिवासी परिवार अब खाना पकाने के लिए बायोगैस पर आत्मनिर्भर हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेशनल यूनिटी डे 2025 के ऐलान के बाद गरुड़ेश्वर तालुका में बायोगैस प्लांट लगाने का काम तेजी से चल रहा है। अब तक 665 परिवारों के घरों में प्लांट चालू हो चुके हैं।

एकतानगर के आसपास के 89 गांवों में चल रहे इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट से आदिवासी परिवारों की रसोई धुआं-मुक्त हो रही है। इस स्कीम का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक ईंधन की जगह ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देना है। जिन परिवारों के पास कम से कम तीन पशु हैं, उन्हें दो क्यूबिक मीटर क्षमता का फ्लेक्सी बायोगैस प्लांट दिया जा रहा है।

प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर धीरज भील ने आईएएनएस से बात करते हुए बताया, “इस प्रोजेक्ट के तहत 1,000 लाभार्थियों का चयन किया गया है। लाभार्थियों को 100 प्रतिशत सब्सिडी दी जा रही है। उन्हें कुछ भी पैसा नहीं देना पड़ता। सरकार पूरी लागत वहन करती है और प्लांट मुफ्त में इंस्टॉल कर दिया जाता है।”

लाभार्थी को रोजाना सुबह करीब 10 किलो गाय का गोबर और 90 किलो पानी प्लांट में डालना होता है। इससे बनने वाली गैस 7 से 8 सदस्यों वाले परिवार के भोजन बनाने के लिए पर्याप्त होती है। एक महीने में औसतन दो एलपीजी सिलेंडर की बचत हो रही है।

लाभार्थी महेश तड़वी ने कहा, “हमारे पास दो भैंस और एक गाय है। उनके गोबर से गैस बन रही है। पहले लकड़ी जुटाने में काफी मेहनत लगती थी, अब वह समस्या खत्म हो गई है। जो पैसे बच रहे हैं, उनका इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई में कर रहे हैं।”

महिला लाभार्थी संगीता तड़वी ने बताया, “अब सिलेंडर लेने के लिए बाजार नहीं जाना पड़ता। बायोगैस प्लांट से गैस बन रही है और खाद भी मिल रही है, जिसका उपयोग खेत और बगीचे में कर रहे हैं।”

इस पहल से न केवल ईंधन का खर्च बच रहा है, बल्कि लकड़ी काटने की प्रथा भी कम हुई है। धुएं से होने वाली आंखों और सांस की बीमारियां घटी हैं। प्लांट से निकलने वाला घोल बेहतरीन जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल हो रहा है, जिससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हो रही है।

सरकार प्रत्येक प्लांट पर 30 हजार रुपए की सहायता दे रही है। शेष 335 प्लांट नर्मदा जिला पंचायत और डीआरडीए के माध्यम से लगाए जा रहे हैं। यह परियोजना प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत और स्वच्छ ऊर्जा के विजन को आदिवासी क्षेत्र में साकार कर रही है।