नई दिल्ली, 28 मई (आईएएनएस)। चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले (वर्तमान हापुड़) के नूरपुर गांव में एक मध्यमवर्गीय कृषक परिवार में हुआ था। वे तेवतिया गोत्र के जाट परिवार से संबंध रखते थे और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानी राजा नाहर सिंह के वंशज थे। पिता मीर सिंह एक किसान थे। चौधरी चरण सिंह का बचपन धूल, मिट्टी और फसलों के बीच बीता, जिसने उन्हें ग्रामीण समाज के दर्द को बहुत करीब से महसूस करने का मौका दिया।
उन्होंने 1923 में आगरा कॉलेज से विज्ञान स्नातक (बीएससी) किया, 1925 में इतिहास में एम.ए. की उपाधि हासिल की और 1927 में मेरठ कॉलेज से कानून (एलएलबी) की पढ़ाई पूरी की। महात्मा गांधी और सरदार पटेल के विचारों से ओतप्रोत होकर वे जल्द ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। नमक सत्याग्रह (1930) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान उन्हें कई बार ब्रिटिश जेलों की हवा खानी पड़ी, लेकिन उनका हौसला कभी डगमगाया नहीं।
स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के कृषि और राजस्व मंत्री के रूप में चौधरी चरण सिंह ने जो किया, वह भारतीय प्रशासनिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उनका सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान ‘उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950’ (जो 1952 में लागू हुआ) था।
चौधरी चरण सिंह ने 1 अप्रैल 1967 को कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने ‘भारतीय क्रांति दल’ (बीकेडी) बनाया और 3 अप्रैल 1967 को वे उत्तर प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने।
कृषक जातियों को राजनीतिक रूप से सशक्त करने के लिए उन्होंने ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत) का एक मजबूत सामाजिक गठबंधन तैयार किया। हरित क्रांति और भूमि सुधारों के कारण ये पिछड़ी और मध्यवर्ती कृषक जातियां आर्थिक रूप से मजबूत हो चुकी थीं, और चौधरी चरण सिंह ने इन्हें संगठित कर उत्तर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था से पारंपरिक उच्च-जातीय राजनीतिक वर्चस्व को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।
आपातकाल के बाद, 1977 के ऐतिहासिक चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनी। मोरारजी देसाई की कैबिनेट में गृह मंत्री और वित्त मंत्री के रूप में शानदार काम करने के बाद, राजनीतिक उथल-पुथल के बीच 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह ने भारत के पांचवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
भले ही उनका कार्यकाल छोटा रहा हो, लेकिन इसी दौरान देश के विकास का एजेंडा हमेशा के लिए बदल गया। उन्होंने ग्रामीण विकास विभाग को पूर्ण मंत्रालय का दर्जा दिलाया और नाबार्ड की स्थापना के लिए ठोस वैचारिक आधार तैयार किया।
29 मई 1987 को 84 वर्ष की आयु में इस महान नेता ने दुनिया को अलविदा कह दिया। दिल्ली में यमुना तट पर स्थित उनके समाधि स्थल को ‘किसान घाट’ नाम दिया गया। उनके जन्मदिवस, 23 दिसंबर, को देश में प्रतिवर्ष ‘राष्ट्रीय किसान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने की घोषणा की। 30 मार्च 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान उनके पोते जयंत चौधरी को सौंपा।

