Wednesday, June 10, 2026
SGSU Advertisement
Home राष्ट्रीय शंकराचार्य का पहला पाठ अनुशासन, अविमुक्तेश्वरानंद खुद ही विवाद खड़ा कर रहे...

शंकराचार्य का पहला पाठ अनुशासन, अविमुक्तेश्वरानंद खुद ही विवाद खड़ा कर रहे : सत्येंद्र जी महाराज

0
32

पटना, 23 जनवरी (आईएएनएस)। पटना स्थित मातृ उद्बोधन आश्रम के डायरेक्टर सत्येंद्र जी महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को गलत ठहराते हुए कहा है कि धर्मगुरु का सबसे पहला पाठ अनुशासन है। शंकराचार्य की अलग मर्यादा है। जो व्यवस्था बनाई गई है, उसमें सहयोग करना और धर्म के अनुसार व्यवस्था को आगे बढ़ाना ही शंकराचार्य का काम होना चाहिए। लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद स्वयं इसके अनुरूप नहीं हैं।

सत्येंद्र जी महाराज ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा, “शंकराचार्य का महत्व और पद की गरिमा, उनके व्यवहार से मेल नहीं खाती। आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म की स्थापना और उसके प्रचार-प्रसार के लिए चारों मठों में शंकराचार्यों को नियुक्त किया था। तीन अन्य शंकराचार्य कभी विवादों में नहीं पड़ते। वे खुद को झगड़ों में नहीं फंसाते। लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद लगातार विवादों में पड़ते हैं।”

उन्होंने आरोप लगाया कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के एजेंट बनकर काम कर रहे हैं। अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद ही सारा मामला खड़ा किया। अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार और प्रशासनिक सिस्टम को चुनौती दी और फिर दावा किया कि प्रशासन ने उनके साथ ऐसा किया।

सत्येंद्र जी महाराज ने कहा, “कोई अन्य शंकराचार्य माघ मेले में नहीं गया, सिर्फ अविमुक्तेश्वरानंद ही क्यों वहां पहुंचे? वहां जाकर उन्होंने पालकी से जाने की जिद की। यह कोई अनुशासन नहीं है। यह अनुशासनहीनता है। वे कैसे संत कहलाने के अधिकारी हैं?”

अविमुक्तेश्वरानंद को स्वयंभू शंकराचार्य बताते हुए सत्येंद्र जी महाराज ने कहा कि सरकार यह मुद्दा नहीं उठा रही है, वह खुद ही विवाद को जन्म दे रहे हैं। अगर ऐसे खुद को शंकराचार्य कहने वाले लोग इस तरह की गड़बड़ी करते हैं और व्यवस्थाओं का साथ नहीं देते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि सरकार कार्रवाई करेगी।

बता दें कि 17 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रयागराज मेघा मेला में संगम घाट पर स्नान करने पहुंचे थे। पूरे लाव-लश्कर के साथ वह अपनी पालकी पर आए थे, लेकिन पुलिस प्रशासन ने उन्हें बिना रथ के आगे बढ़ने को कहा। इसी बात पर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला व्यवस्था में जुटे कर्मचारियों के बीच विवाद हुआ था। बाद में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासन पर आरोप लगाया कि उनके साथ यह व्यवहार जानबूझकर किया गया है। विवाद उस समय और बढ़ा, जब अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेले में ही धरने पर बैठ गए।