Saturday, August 22, 2026
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झारखंड आंदोलन के जननायक शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण

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रांची, 25 जनवरी (आईएएनएस)। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और अलग झारखंड राज्य आंदोलन के सबसे बड़े नायक रहे शिबू सोरेन को भारत सरकार ने मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान देने की घोषणा की है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर गृह मंत्रालय की ओर से घोषित पद्म पुरस्कारों की सूची में उनका नाम शामिल किया गया है। इसे आदिवासी समाज, झारखंड आंदोलन और जनसंघर्षों की राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर मिली बड़ी मान्यता के रूप में देखा जा रहा है।

नई दिल्ली में शिबू सोरेन का निधन पिछले साल 4 अगस्त को इलाज के दौरान हो गया था। उनका जीवन संघर्ष, विद्रोह और सामाजिक चेतना की मिसाल रहा है। उनका जन्म 11 अप्रैल 1944 को तत्कालीन बिहार राज्य के हजारीबाग जिले (अब रामगढ़) के गोला प्रखंड अंतर्गत नेमरा गांव में हुआ था। जब वे मात्र 12 वर्ष के थे, तब उनके पिता सोबरन मांझी की हत्या सूदखोर महाजनों ने कर दी। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी।

बालक शिबू सोरेन ने तभी संकल्प लिया कि वे न केवल अपने पिता की हत्या का बदला लेंगे, बल्कि आदिवासी समाज को महाजनी शोषण से मुक्त कराएंगे। पिता की हत्या के बाद उन्होंने वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी। इस दौरान परिवार को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन यही संघर्ष उन्हें जनआंदोलन की राह पर ले गया। उन्होंने गांव-गांव घूमकर आदिवासियों को संगठित करना शुरू किया और महाजनों के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। धनबाद, हजारीबाग और गिरिडीह क्षेत्रों में यह आंदोलन कई बार हिंसक रूप भी ले बैठा।

शिबू सोरेन और उनके समर्थक तीर-धनुष के साथ चलते थे। उन्होंने ‘धान काटो आंदोलन’ का नेतृत्व किया, जिसमें आदिवासी महिलाएं खेतों में उतरतीं और पुरुष पहरा देते थे। इस संघर्ष के कारण वे प्रशासन के लिए चुनौती बन गए। कई मामलों में उन्हें जेल जाना पड़ा और कई बार अंडरग्राउंड भी रहना पड़ा। उन्होंने पारसनाथ की पहाड़ियों और टुंडी के जंगलों में समय बिताया, लेकिन उनका जनाधार लगातार बढ़ता गया। इसी दौर में उन्होंने ‘सोनोत संताल’ संगठन की स्थापना की और आदिवासी चेतना को संगठित स्वर दिया।

संताली समाज ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि दी, जिसका अर्थ है ‘देश का नेता’। 4 फरवरी 1972 को धनबाद में ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (जेएमएम) की स्थापना हुई। यह संगठन शिबू सोरेन के ‘सोनोत संताल’ और विनोद बिहारी महतो के ‘शिवाजी समाज’ के विलय से बना। शिबू सोरेन महासचिव बने और विनोद बिहारी महतो अध्यक्ष।

जेएमएम ने शीघ्र ही झारखंड, ओडिशा और बंगाल के आदिवासी इलाकों में मजबूत आधार बना लिया। शिबू सोरेन 1980 में पहली बार दुमका से सांसद चुने गए। 1991 में विनोद बिहारी महतो के निधन के बाद वे जेएमएम के केंद्रीय अध्यक्ष बने और पार्टी के पर्याय बन गए। उनके नेतृत्व में अलग झारखंड राज्य आंदोलन निर्णायक मोड़ पर पहुंचा और वर्ष 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ। वे 2005, 2008 और 2009 में तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने और दो बार केंद्रीय मंत्री भी रहे।

बता दें कि झारखंड विधानसभा ने अगस्त 2025 में उनके निधन के बाद सर्वसम्मति से उन्हें भारत रत्न देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था। अब मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान को उनके संघर्षपूर्ण जीवन, आदिवासी चेतना और झारखंड आंदोलन के प्रति देश की कृतज्ञता के रूप में देखा जा रहा है।