नई दिल्ली, 11 फरवरी (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 2020 के दिल्ली दंगों के ‘बड़ी साजिश मामले’ में आरोपी तसलीम अहमद द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया है। उन्होंने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत जमानत देने से इनकार करने के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने तसलीम अहमद की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है। यह याचिका दिल्ली हाईकोर्ट के 2 सितंबर 2025 के उस फैसले को चुनौती देती है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा उनकी तीसरी नियमित जमानत अर्जी खारिज करने के आदेश को बरकरार रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध केस स्टेटस के अनुसार, यह मामला 6 अप्रैल 2026 को सूचीबद्ध होने की संभावना है।
तसलीम अहमद को 24 जून 2020 को क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया था और वह तब से न्यायिक हिरासत में हैं। यह गिरफ्तारी 23 से 25 फरवरी 2020 के बीच उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध के दौरान हुई हिंसा के सिलसिले में की गई थी।
उन पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), शस्त्र अधिनियम, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान की रोकथाम अधिनियम और यूएपीए की धाराएं 13, 16, 17 और 18 के तहत आरोप हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, वह जाफराबाद, मौजपुर, चांद बाग और गोकुलपुरी सहित कई इलाकों में हुए दंगों को भड़काने और साजिश रचने के बड़े षड्यंत्र का हिस्सा थे।
अहमद का कहना है कि उन्होंने केवल सीएए का विरोध किया था, और उन्हें आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किया गया।
उनके अलावा इस कथित बड़ी साजिश मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान, शादाब अहमद, अथर खान, अब्दुल खालिद सैफी सहित अन्य आरोपी भी शामिल हैं।
अपने विस्तृत फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत केवल ट्रायल में देरी के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने कहा था कि लंबी हिरासत या मुकदमे में देरी जैसे कारकों को, अपराध की गंभीरता या आरोपी की भूमिका पर विचार किए बिना, जमानत देने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।”
अहमद की उस दलील को खारिज करते हुए कि वह पांच साल से अधिक समय से हिरासत में हैं और अब तक ट्रायल शुरू नहीं हुआ, हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने की बहस में देरी के लिए काफी हद तक खुद आरोपी ही जिम्मेदार थे। अदालत ने रिकॉर्ड किया कि दिन-प्रतिदिन सुनवाई के निर्देशों के बावजूद आरोपियों के वकील बहस के लिए तैयार नहीं थे और चेतावनी दी कि किसी भी देरी को अदालत गंभीरता से लेगी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने आगे कहा कि “मौलिक अधिकारों के स्पष्ट उल्लंघन” वाले मामलों को छोड़कर, यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत केवल लंबी हिरासत के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती, खासकर जब आरोपी ने मामले पर बहस नहीं की हो।
पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में सह-आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अदालत ने कहा था कि अभियोजन की सामग्री को समग्र रूप से देखने पर यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि आरोप प्रथम दृष्ट्या सही हैं, जैसा कि यूएपीए की धारा 43डी(5) में अपेक्षित है।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने पांच अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी, जबकि इमाम और खालिद को राहत देने से इनकार कर दिया।
दिल्ली पुलिस का आरोप है कि कई छात्र कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों ने फरवरी 2020 के दंगों के दौरान हिंसा भड़काने की पूर्व-नियोजित साजिश रची थी, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई और 700 से अधिक लोग घायल हुए। यह विरोध प्रदर्शन उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान किए गए थे ताकि अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया जा सके।

