केरल: देवस्वोम बोर्ड ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर अपना रुख बदला

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तिरुवनंतपुरम, 2 मार्च (आईएएनएस)। केरल विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही एक बार फिर सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा गरमा गया है। वाम सरकार के नियंत्रण वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने सोमवार को इस विवादित मुद्दे पर नाटकीय रूप से अपना रुख बदल दिया। इसके बाद ध्रुवीकरण वाली बहस शुरू हो गई है।

बोर्ड के अध्यक्ष के. जयकुमार ने पत्रकारों से कहा कि देवस्वम बोर्ड महिलाओं के मासिक धर्म आयु वर्ग के प्रवेश का समर्थन करने वाले अपने पहले के हलफनामे को वापस लेगा। इसके बजाय बोर्ड अब यह दलील देगा कि मंदिर की लंबे समय से चली आ रही परंपराओं की रक्षा की जानी चाहिए।

उन्होंने बताया कि 2019 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे को इसी अनुसार संशोधित किया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक संवेदनशीलता लगातार बढ़ रही है।

महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में पहले लिया गया रुख व्यापक विरोध प्रदर्शनों और श्रद्धालुओं के एक वर्ग की तीखी प्रतिक्रिया का कारण बना था। 2019 के लोकसभा चुनाव में इसका राजनीतिक नुकसान सीपीआई-एम के नेतृत्व वाली सरकार को उठाना पड़ा था। उस समय मुख्यमंत्री पी. विजयन महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में खुलकर सामने आए थे और इसके लिए व्यापक अभियान भी चलाया था।

माना जा रहा है कि इस बार चुनाव से पहले संभावित जनआंदोलन को रोकने के लिए यह रुख बदला गया है।

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार समेत सभी पक्षों को 14 मार्च तक अपना-अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश दिया था। इस निर्देश ने विजयन सरकार को संवेदनशील स्थिति में ला खड़ा किया है, क्योंकि अब उसे शीर्ष अदालत के समक्ष औपचारिक रूप से अपना रुख स्पष्ट करना होगा।

जहां बोर्ड ने परंपरा के पक्ष में दलील देने का निर्णय लिया है, वहीं राज्य सरकार का रुख राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से विस्तृत सुनवाई शुरू करेगी। सभी पक्षों को पहले से लिखित दलीलें दाखिल करनी होंगी और 22 अप्रैल तक बहस पूरी करने का कार्यक्रम तय किया गया है।

केंद्र सरकार पहले ही उस पुनर्विचार याचिका के समर्थन का संकेत दे चुकी है, जिसमें पूर्व की पांच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने वाले फैसले को चुनौती दी गई है।

सबरीमाला से इतर अदालत 67 संबंधित याचिकाओं पर भी विचार करेगी, जिनमें अनुच्छेद 25 और 26 के तहत व्यक्तिगत अधिकार, धार्मिक प्रथाओं की अनिवार्यता, संवैधानिक नैतिकता और आस्था से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमा जैसे व्यापक संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।