नई दिल्ली, 2 अप्रैल (आईएएनएस)। कथित टेंडर कमीशन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को झारखंड के पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम और उनके निजी सचिव संजीव लाल की जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाई जाए।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने दोनों आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया। ये दोनों आरोपी 18 महीने से ज्यादा समय से न्यायिक हिरासत में हैं। ट्रायल कोर्ट को बेंच ने यह निर्देश दिया कि वह चार हफ्तों के अंदर मुख्य गवाहों के बयान दर्ज करे।
बेंच ने यह भी साफ कर दिया कि अगली सुनवाई की तारीख तभी तय की जाएगी, जब गवाहों से पूछताछ पूरी हो जाएगी।
सुनवाई के दौरान, आलम के वकील ने दलील दी कि उनके मुबक्किल मई 2024 से हिरासत में हैं। उन्होंने ट्रायल की कार्यवाही में हो रही देरी का जिक्र किया, जिसकी वजह एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी) द्वारा बार-बार दायर की जा रही सप्लीमेंट्री चार्जशीट हैं।
बचाव पक्ष ने अभियोजन की मंजूरी न होने की बात भी उठाई। हालांकि, कोर्ट ने इन आधारों को जमानत देने के लिए काफी नहीं माना।
संजीव लाल, जिन्होंने इन्हीं आधारों पर जमानत मांगी थी, उन्हें भी फिलहाल कोई राहत नहीं दी गई।
यह मामला ग्रामीण विकास विभाग में कथित अनियमितताओं को लेकर ईडी की जांच से जुड़ा है। 6 मई 2024 को एजेंसी ने संजीव लाल और उनके सहयोगी जहांगीर आलम से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की, जिसमें 32.20 करोड़ रुपए नकद बरामद हुए। इसके अलावा, लाल से 10.05 लाख रुपए और एक डायरी भी जब्त की गई, जिसमें कथित तौर पर कमीशन के लेन-देन का ब्योरा दर्ज था।
जांच के बाद, 15 मई 2024 को आलमगीर आलम को गिरफ्तार कर लिया गया। ईडी ने आरोप लगाया है कि सरकारी टेंडर आवंटित करने के बदले कमीशन वसूलने के लिए एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा था।
एजेंसी के अनुसार, ठेकेदारों को कथित तौर पर कुल ठेके की कीमत का लगभग तीन प्रतिशत कमीशन के तौर पर देना पड़ता था। इसमें से, लगभग 1.35 प्रतिशत राशि कथित तौर पर तत्कालीन मंत्री तक उनके निजी सचिव के माध्यम से पहुंचाई जाती थी, जबकि 0.65 से 1 प्रतिशत राशि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों में बांटी जाती थी और शेष राशि इंजीनियरों सहित अन्य कर्मचारियों के बीच साझा की जाती थी।
ईडी का दावा है कि कथित घोटाले से लगभग 3,048 करोड़ रुपए के टेंडर आवंटन के संबंध में 90 करोड़ रुपए से अधिक की अवैध कमाई हुई।
आरोपों की गंभीरता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए त्वरित सुनवाई की जरूरत पर बल दिया।


