फ्लोर टेस्ट में भाग लेने से रोक लगाने वाले मद्रास हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे टीवीके विधायक

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नई दिल्ली, 12 मई (आईएएनएस)। तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) के विधायक आर. श्रीनिवास सेतुपति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मद्रास हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें तमिलनाडु विधानसभा में किसी भी फ्लोर टेस्ट की कार्यवाही में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था। यह विवाद तिरुपत्तूर विधानसभा सीट से उनकी एक वोट की जीत को लेकर है।

इस मामले का मंगलवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के सामने वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।

मद्रास हाई कोर्ट की पीठ ने सेतुपति को किसी भी फ्लोर टेस्ट, विश्वास मत, अविश्वास प्रस्ताव, ट्रस्ट वोट या तमिलनाडु विधानसभा की ऐसी किसी भी मतदान प्रक्रिया में भाग लेने से, जहां सदन की संख्या शक्ति की परीक्षा होती हो, अगले आदेश तक रोक दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दी गई।

जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी और एन. सेंथिलकुमार की पीठ ने यह अंतरिम आदेश डीएमके नेता और पूर्व तमिलनाडु मंत्री के.आर. पेरियाकरुप्पन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। पेरियाकरुप्पन शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर विधानसभा सीट से सिर्फ एक वोट से चुनाव हार गए थे।

चुनाव आयोग द्वारा घोषित आधिकारिक नतीजों के अनुसार, सेतुपति को 83,365 वोट मिले, जबकि पेरियाकरुप्पन को 83,364 वोट प्राप्त हुए।

पेरियाकरुप्पन ने मतगणना प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियों का आरोप लगाया। उनका कहना था कि शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर विधानसभा क्षेत्र संख्या 185 के लिए डाला गया एक पोस्टल बैलेट गलती से वेल्लोर के पास तिरुपत्तूर जिले की विधानसभा क्षेत्र संख्या 50 भेज दिया गया, जहां उसे वापस सही क्षेत्र में भेजने के बजाय रद्द कर दिया गया।

अपने आदेश में मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला एक अजीब संवैधानिक स्थिति को दर्शाता है, जहां एक पोस्टल बैलेट को कथित रूप से समान नाम वाले दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में भेज दिया गया और वहीं रद्द कर दिया गया।

अदालत ने कहा कि यह सिर्फ वोटों की दोबारा गिनती या वोट रद्द करने का सामान्य चुनावी विवाद नहीं है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने में प्रशासनिक विफलता से जुड़ा मामला है।

अदालत ने यह भी कहा कि जब चुनाव का फैसला सिर्फ एक वोट के अंतर से हुआ हो, तब हर वोट सिर्फ महत्वपूर्ण नहीं बल्कि परिणाम तय करने वाला हो सकता है।

ईवीएम वोटों में दो आधिकारिक स्रोतों के बीच कथित 18 वोटों के अंतर और विवादित पोस्टल बैलेट का जिक्र करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि इतने कम अंतर से हुई जीत के मामले में इन मुद्दों को शुरुआती स्तर पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट ने चुनाव अधिकारियों को मतगणना प्रक्रिया से जुड़े सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया। इसमें पोस्टल बैलेट रिकॉर्ड, रद्द किए गए पोस्टल बैलेट कवर, ईवीएम वोट रिकॉर्ड, मतगणना की वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य संबंधित सामग्री शामिल हैं।

साथ ही, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके अंतरिम आदेश का मतलब सेतुपति का चुनाव रद्द करना नहीं है और न ही इससे याचिकाकर्ता को विजेता घोषित किए जाने का कोई अधिकार मिलता है।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि परिणाम घोषित होने के बाद किसी भी विवाद का निपटारा केवल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत चुनाव याचिका के जरिए ही किया जा सकता है।