रांची, 14 मई (आईएएनएस)। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में पुलिस कस्टडी और जेल में होने वाली मौतों (कस्टोडियल डेथ) एवं दुष्कर्म की घटनाओं से संबंधित जनहित याचिका पर अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक एवं जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने आदेश दिया है कि अब राज्य में पुलिस या जेल कस्टडी में होने वाली किसी भी मौत या दुष्कर्म के मामले की ज्यूडिशियल इंक्वायरी (न्यायिक जांच) कराना पूरी तरह अनिवार्य होगा।
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 196(2) और पूर्ववर्ती कानून सीआरपीसी की धारा 176(1-ए) के तहत इस न्यायिक जांच को अनिवार्य घोषित किया है।
गौरतलब है कि पूर्व में झारखंड सरकार पुलिस या जेल हिरासत में होने वाली मौतों और दुष्कर्म के मामलों की जांच एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (कार्यपालक दंडाधिकारी) से कराती थी और राज्य में न्यायिक जांच को अनिवार्य नहीं माना जा रहा था। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब यह व्यवस्था पूरी तरह बदल जाएगी।
इसके साथ ही खंडपीठ ने झारखंड लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (झालसा) को निर्देश दिया है कि वह हिरासत में मौत या दुष्कर्म के मामलों में नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन, नई दिल्ली की गाइडलाइंस के अनुरूप एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तैयार करे, ताकि ऐसी घटनाओं की निष्पक्ष और सही ढंग से जांच सुनिश्चित की जा सके।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार ऐसे करीब 250 मामले हैं, जिनमें कस्टोडियल डेथ होने के बावजूद अब तक न्यायिक जांच नहीं कराई गई है। इस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने संबंधित जिलों के जिला जजों (डिस्ट्रिक्ट जजों) को निर्देश दिया है कि वे इन मामलों में न्यायिक जांच न होने के कारणों को स्पष्ट करते हुए अपनी विस्तृत रिपोर्ट सीधे हाईकोर्ट को सौंपें। इस मामले की पूर्व में हुई सुनवाई के दौरान राज्य के गृह सचिव द्वारा दाखिल किए गए शपथ पत्र में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ था।
शपथ पत्र में सरकार ने स्वीकार किया था कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच झारखंड में पुलिस और जेल कस्टडी में करीब 500 मौतें हुई हैं। इनमें से लगभग आधे मामलों में ज्यूडिशियल इंक्वायरी नहीं कराई गई थी। इसके बाद अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए दोनों पक्षों की बहस पूरी होने पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
मामले में प्रार्थी मोहम्मद मुमताज अंसारी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता शादाब अंसारी ने लिखित बहस के साथ सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और एनएचआरसी के दिशा-निर्देशों को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया था, जिसके आधार पर अदालत ने यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी है।

