नई दिल्ली, 25 जुलाई (आईएएनएस)। कांग्रेस के महासचिव और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि 17 जुलाई को उनके 12 जून और 16 मई के पत्रों का जवाब देने के लिए वह रक्षा मंत्री के आभारी हैं, लेकिन उनके जवाब के बाद भी कई महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित हैं, जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
जयराम रमेश ने पत्र में कहा कि ग्रेट निकोबार परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘गैलाथिया बे’ में प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है, जो पूरी तरह एक व्यावसायिक परियोजना है। इस परियोजना के कुल बजट का लगभग आधा हिस्सा केवल बंदरगाह निर्माण पर खर्च होना है। 17 और 19 मार्च 2026 को वित्त मंत्रालय की पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप समिति की बैठकों में लिए गए निर्णय के अनुसार, केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय इस परियोजना के लिए वायबिलिटी गैप फंडिंग देगा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसका मुख्य उद्देश्य व्यावसायिक है।
उन्होंने कहा कि परियोजना का रक्षा से जुड़ा हिस्सा केवल दोहरे उपयोग (ड्यूल-परपज) वाला प्रस्तावित हवाई अड्डा है। इसके लिए परियोजना की कुल 166 वर्ग किलोमीटर भूमि का केवल 5 प्रतिशत हिस्सा चाहिए और परियोजना के कुल बजट का करीब 10 प्रतिशत ही इस एयरपोर्ट पर खर्च होना है। ऐसे में पूरे प्रोजेक्ट को रणनीतिक महत्व का बताना अतिशयोक्ति है।
जयराम रमेश ने हाल ही में जारी ‘ग्रेट निकोबार डेवलपमेंट एरिया मास्टर प्लान-2047’ का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस योजना में क्रूज़ पर्यटन टर्मिनल, हर साल 10 लाख पर्यटकों को आकर्षित करने का लक्ष्य, कैसीनो, डिस्कोथेक, थीम पार्क, एम्यूजमेंट पार्क और वाटर पार्क जैसी मनोरंजन परियोजनाएं तथा दक्षिण कोरिया के बुसान इंटरनेशनल फाइनेंस सेंटर और सिंगापुर के मरीना बे फाइनेंस सेंटर की तर्ज पर एक वित्तीय केंद्र विकसित करने का प्रस्ताव शामिल है। यह परियोजना रणनीतिक कम और एक महत्वाकांक्षी रियल एस्टेट परियोजना अधिक दिखाई देती है।
उन्होंने ‘गैलाथिया बे’ में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट की तुलना मौजूदा ‘आईएनएस बाज’ के विस्तार से करते हुए सरकार के दावों पर सवाल उठाए। बता दें कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ग्रेट निकोबार द्वीप पर कैम्पबेल बे के पास स्थित भारतीय नौसेना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक नौसैनिक वायु स्टेशन है।
जयराम रमेश ने कहा कि 16 मई के अपने पत्र में उन्होंने सात पर्यावरणीय चिंताएं उठाई थीं, जिनमें दो वनाच्छादित पहाड़ियों की कटाई, शोम्पेन जनजाति के संरक्षित वन क्षेत्र को नुकसान, कोस्टल जोन रेगुलेशन-2019 के तहत सर्वाधिक संरक्षित क्षेत्र में निर्माण, समुद्री जीवन और खाड़ियों पर प्रभाव, पूर्व सैनिक परिवारों का तीसरी बार विस्थापन, अंतरराष्ट्रीय पक्षी प्रवास मार्गों पर असर और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के निकट निर्माण शामिल हैं। इन सवालों का अब तक कोई जवाब नहीं दिया गया है। साथ ही, भूकंप और सुनामी के जोखिमों का भी वास्तविक आकलन नहीं किया गया है।
उन्होंने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की मंजूरी का भी जिक्र किया। जयराम रमेश ने कहा कि जिस हाई-पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी ने मंजूरी दी, वह आज भी सार्वजनिक नहीं की गई है। इससे सरकार के पारदर्शिता के दावे कमजोर पड़ते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने कई बार पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री को पत्र लिखकर पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्टों की खामियों की ओर ध्यान दिलाया है। उनके अनुसार, ये रिपोर्टें मंत्रालय के अपने दिशा-निर्देशों की भावना और प्रावधानों के अनुरूप नहीं हैं।
पत्र में उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना के कई वरिष्ठ और प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त अधिकारी, जिनके पास अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में वर्षों का अनुभव है, इस परियोजना के रणनीतिक औचित्य पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने रक्षा मंत्री से आग्रह किया कि ऐसे अधिकारियों से परामर्श कर उनकी चिंताओं को सुना जाए।

