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तुलु भाषा को राष्ट्रीय मान्यता दिलाने और उसके विकास के मिशन का प्रस्ताव सौंपा गया

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बेंगलुरु, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुरुवार को ‘तुलु भाषा राष्ट्रीय मान्यता और विकास मिशन 2026-2035’ शुरू करने का प्रस्ताव सौंपा गया। इस प्रस्ताव में तुलु भाषा और उसकी सांस्कृतिक विरासत को संवैधानिक मान्यता दिलाने, उसे संरक्षित करने, डिजिटाइज करने, उसकी शिक्षा और प्रचार-प्रसार के उपायों पर अलग-अलग मंत्रालयों के बीच समीक्षा करने की मांग की गई है।

कर्नाटक राज्य नीति और योजना आयोग के सदस्य एस. मोहनदास हेगड़े द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव में संविधान की आठवीं अनुसूची में तुलु भाषा को शामिल करने और इसकी साहित्यिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के रिसर्च और संरक्षण के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा बनाने पर विचार करने की मांग की गई है।

इस प्रस्ताव में 2011 की जनगणना के आंकड़ों का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार तुलु बोलने वाले मूल लोगों की संख्या 18,46,849 है और इसमें भारत और विदेशों में इस भाषा की मौजूदगी पर भी जोर दिया गया है। इसमें तुलु के भाषाई इतिहास, पांडुलिपियों, शिलालेखों, मौखिक परंपराओं और तुलु-तिगलारी लिपि पर व्यवस्थित रिसर्च का प्रस्ताव है।

प्रस्ताव में तुलु नाडु के इतिहास पर एक खास रिसर्च प्रोजेक्ट की भी मांग की गई है, जिसमें अलुपा राजवंश, बरकुर और तुलुवा राजवंश और विजयनगर साम्राज्य के बीच ऐतिहासिक संबंधों को शामिल किया गया है। इसमें स्थापित ऐतिहासिक सबूतों को विवादित दावों और सांस्कृतिक परंपराओं से अलग करने की बात कही गई है।

दस्तावेज में ‘दोहरी-लिपि सामंजस्य मॉडल’ का प्रस्ताव है, जिसके तहत कन्नड़ समकालीन प्रशासन और सार्वजनिक शिक्षा का माध्यम बनी रहेगी, जबकि तुलु-तिगलारी का इस्तेमाल पांडुलिपि संरक्षण, शिलालेखों और विद्वतापूर्ण रिसर्च के लिए किया जाएगा।

यह प्रस्ताव मंगलुरु में 18 सितंबर को हुई कर्नाटक कैबिनेट की बैठक के ठीक बाद आया है, जिसमें दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में प्रशासनिक कार्यों के लिए तुलु को राज्य की दूसरी अतिरिक्त आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का फैसला किया गया था।

सरकार ने अनुवाद, प्रशिक्षण और संबंधित कार्यान्वयन उपायों के लिए सालाना 82 लाख रुपए आवंटित करने की भी घोषणा की है।

प्रस्ताव में तीन नीतिगत रास्ते बताए गए हैं जिनमें संवैधानिक मान्यता, शास्त्रीय भाषा का दर्जा पाने के लिए तुलु की पात्रता की जांच और 10 साल के राष्ट्रीय मिशन का खाका शामिल है। इसमें विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट के लिए 450 करोड़ रुपए के अनुमानित बजट का प्रस्ताव है, साथ ही भाषा तकनीक, पांडुलिपि संरक्षण, शिलालेखों और शिक्षा से संबंधित मौजूदा केंद्रीय योजनाओं के साथ तालमेल बिठाने का सुझाव भी दिया गया है।

इस प्रस्ताव में प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुरोध किया गया है कि वह संबंधित मंत्रालयों को इस प्रस्ताव की अंतर-मंत्रालयी जांच शुरू करने के लिए उचित निर्देश जारी करे।