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अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस: जब महात्मा गांधी से चिढ़ गए थे विंस्टन चर्चिल, बताने लगे थे ‘फकीर’

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नई दिल्ली, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। 1931 में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहा था, “यह देखना खतरनाक और घिनौना है कि मिस्टर गांधी, जो वकील और राजद्रोही रहे हैं, एक फकीर का रूप धरकर आधे-अधूरे कपड़ों में वायसराय के महल की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं, ताकि वे राजा-सम्राट के प्रतिनिधि के साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत कर सकें।”

यह बयान तब दिया गया था, जब गांधीजी ने सिले हुए कपड़े छोड़कर लंगोटी और शॉल पहनना शुरू कर दिया था, जिन्हें वे अक्सर खुद ही बुनते थे। यह वही साल था जब लंदन यात्रा के दौरान उन्हें बकिंघम पैलेस में क्वीन मैरी और किंग जॉर्ज पंचम के साथ चाय पर बुलाया गया था।

अपनी पारंपरिक लंगोटी पहने, नंगे शरीर पर ढीली-ढाली शॉल ओढ़े और घर पर बनी सैंडल पहने वे बकिंघम पैलेस पहुंचे थे, जिसे देखकर पूरी अंग्रेज कौम दंग रह गई थी। जब मुलाकात खत्म हुई और वे महल के गेट से बाहर निकल रहे थे, तो एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें लगता है कि उन्होंने पर्याप्त कपड़े पहने हैं। गांधी जी का जवाब था, “सम्राट ने जितने कपड़े पहने हुए थे, वे हम दोनों के लिए पर्याप्त थे।”

विंस्टन चर्चिल ने गांधी को अपमानजनक ढंग से ‘आधा नंगा फकीर’ कहा था, तो महात्मा गांधी ने इस अभिव्यक्ति को प्रशंसा के रूप में लिया था। अमेरिकी विद्वान आर्थर हरमन ने अपनी पुस्तक ‘गांधी और चर्चिल’ में दोनों के बीच संबंधों को स्पष्ट रूप से दर्शाने का प्रयास किया था। एक लेख में यह भी जिक्र मिलता है कि गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन में रहते हुए महात्मा गांधी चर्चिल से मिलना चाहते थे लेकिन चर्चिल ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया था। हालांकि उनके बेटे रैंडोल्फ चर्चिल ने गांधीजी से मुलाकात की थी।

2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में जन्मे महात्मा गांधी ने जहां अपने आंदोलनों से भारत को आजादी दिलाने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई थी, वहीं पूरे विश्व को सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलने का पाठ पढ़ाया था।

“अहिंसा के सिद्धांत का सार प्रतिद्वंदिता को समाप्त करने के सतत प्रयास में निहित है, प्रतिद्वंदी को नुकसान पहुंचाने में नहीं, अर्थात एक अहिंसक विधि आपके प्रतिद्वंद्वी में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद करती है, उनके मन और दिल को जीतती है और उन्हें सही बात मानने पर राजी करती है।”

महात्मा गांधी के मुताबिक, अहिंसा का मतलब विरोधी में भी मौजूद सत्य का सम्मान करना था। मानव जाति के लिए उनका सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली योगदान सत्य और अंहिसा का संदेश है। इन दो सिद्धांतों को महात्मा गांधी के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन की बुनियाद माना जा सकता है।

उन्होंने अहिंसक विचार और कार्यवाही को ‘सत्याग्रह’ का नाम दिया। ‘सत्याग्रह’ को उन्होंने आत्मबल या सत्यबल के रूप में परिभाषित किया। इस अवधारणा को आलोकित करते हुए उन्होंने लिखा था, “ऐसा कोई भी काम जो मेरी अंतरात्मा के खिलाफ हो, उसका विरोध करने के लिए मैं आत्मबल का उपयोग करता हूं।”

उन्हीं अनूठे सिद्धातों ने वैश्विक स्तर पर महात्मा गांधी को ‘शांति दूत’ का दर्जा दिलाया और दुनिया के तमाम बड़े नेताओं को सत्य व अहिंसा की राह दिखाई।

उनके सत्याग्रह के विचार ने दुनियाभर में नागरिक अधिकार आंदोलनों को प्रेरित किया, जिनमें मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला के नेतृत्व वाले आंदोलन भी शामिल थे। शांतिपूर्ण विरोध और सविनय अवज्ञा के प्रति गांधी की अटूट प्रतिबद्धता ने आधुनिक राजनीतिक सोच और सक्रियता को पूरी तरह से बदल दिया, जिससे वे अहिंसा और न्याय के एक कालजयी प्रतीक बन गए।

1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसका काम अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, देशों के बीच दोस्ताना संबंध विकसित करना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल करना और देशों की गतिविधियों में तालमेल बिठाने का केंद्र बनना है। इसने 2007 में ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ की शुरुआत की।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को एक प्रस्ताव अपनाया, जिसमें 2 अक्टूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में घोषित किया गया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य शिक्षा और जनजागरूकता के माध्यम से अहिंसा के बारे में जागरूकता फैलाना था। संयुक्त राष्ट्र ने 2 अक्टूबर को इसलिए चुना क्योंकि यह महात्मा गांधी का जन्मदिन है और अहिंसक कार्रवाई की विचारधारा और व्यवहार में उनके योगदान को मान्यता दी।

इस आयोजन से गांधी जयंती को एक अंतरराष्ट्रीय आयाम मिलता है, जिसमें गांधी से जुड़े सिद्धांतों पर शांति, सहिष्णुता और समझ के व्यापक संदर्भ में चर्चा की जाती है।