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आरक्षण बढ़ाने के फैसले को रद्द करने वाले हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने पर फैसला: जी. परमेश्वर

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बेंगलुरु, 13 अक्टूबर (आईएएनएस)। कर्नाटक राज्य मंत्रिमंडल अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षण में वृद्धि को रद्द करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने पर फैसला करेगा। यह जानकारी उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने मंगलवार को दी।

उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “जैसा कि मैंने कहा, मंत्रिमंडल फैसला लेगा। हमें अपील करनी चाहिए या नहीं, इसका निर्णय संवैधानिक ढांचे के भीतर ही लिया जाना चाहिए। मंत्रिमंडल यह फैसला करेगा।”

56 प्रतिशत आरक्षण पर उच्च न्यायालय के आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए परमेश्वर ने कहा कि सरकार उपलब्ध कानूनी विकल्पों की जांच करेगी और कैबिनेट में आगे की कार्रवाई पर चर्चा करेगी।

उन्होंने कहा कि आरक्षण की अधिकतम सीमा पहले 50 प्रतिशत थी, लेकिन पिछली सरकार ने अनुसूचित जातियों के लिए कोटा 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोटा तीन प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत करके इसे 56 प्रतिशत तक बढ़ा दिया था। इस संबंध में एक आदेश जारी किया गया था और बाद की भर्ती प्रक्रियाओं में इन्हीं प्रावधानों का पालन किया गया।

उन्होंने कहा, “हमारी सरकार के सत्ता में आने के बाद भी, कई भर्तियों और अन्य प्रक्रियाओं में इन्हीं प्रावधानों का पालन किया गया। सरकार ने भी इस कदम का समर्थन किया और इसके कार्यान्वयन के लिए अभ्यावेदन दिए।”

उपमुख्यमंत्री ने कहा कि आरक्षण बढ़ाने का उद्देश्य सामाजिक न्याय के संवैधानिक दृष्टिकोण के अनुरूप, समुदायों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व प्रदान करना था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को खारिज कर दिया है और सरकार को आगे उठाए जाने वाले कदमों पर निर्णय लेना होगा।

आरक्षण के उद्देश्य पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य उन समुदायों के लिए न्याय सुनिश्चित करना है जो हजारों वर्षों से शैक्षिक, सामाजिक और रोजगार के अवसरों से वंचित रहे हैं।

उन्होंने कहा, “बाबासाहेब अंबेडकर ने आरक्षण का प्रस्ताव क्यों रखा? इसे कार्यकारी आदेशों पर छोड़ने के बजाय संविधान में क्यों शामिल किया गया? इसका उद्देश्य उन लोगों को न्याय दिलाना था जिन्हें हजारों वर्षों से अवसरों से वंचित रखा गया था।”

उन्होंने आगे कहा कि आरक्षण का उद्देश्य वंचित समुदायों को समाज के अन्य वर्गों के साथ प्रगति करने में मदद करना है और कहा कि ऐसे मामलों पर निर्णय लेते समय समानता के संवैधानिक सिद्धांत को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

तमिलनाडु का जिक्र करते हुए, जहां संवैधानिक संशोधन के तहत 69 प्रतिशत आरक्षण लागू है, परमेश्वर ने कहा कि उन्हें लगता है कि परिस्थितियों को देखते हुए कर्नाटक में छह प्रतिशत अंकों की वृद्धि को भी एक विशेष मामले के रूप में माना जा सकता था।

उन्होंने कहा, “जब संवैधानिक ढांचे के तहत उस राज्य के लिए प्रावधान किए गए हैं, तो मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि हमारे राज्य में आरक्षण में मात्र छह प्रतिशत अंकों की वृद्धि को भी परिस्थितियों के आधार पर एक विशेष मामले के रूप में माना जा सकता था। यह मेरी निजी राय है, और मुझे लगता है कि यह निर्णय उचित नहीं है।”

छात्रों और नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों पर इस आदेश के प्रभाव के बारे में परमेश्वर ने कहा कि सरकार सभी निहितार्थों की जांच करेगी, जिसमें यह भी शामिल है कि आदेश पूर्वव्यापी रूप से लागू होगा या भविष्य में लागू होगा।