Saturday, August 22, 2026
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सिनेमा जगत का खास दिन, पहली बार सिनेमेटोग्राफर वी.के. मूर्ति को मिला दादा साहब फाल्के अवॉर्ड

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मुंबई, 20 जनवरी (आईएएनएस)। भारतीय सिनेमा जगत के लिए 20 जनवरी का दिन बेहद यादगार और महत्वपूर्ण है। यह दिन बताता है कि पर्दे पर एक्टिंग का जलवा दिखाने वाले एक्टर्स ही नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे से योगदान देने वाले भी सिनेमा जगत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

20 जनवरी के दिन ही सिनेमेटोग्राफर वी.के. मूर्ति को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया था। इसी दिन साल 2010 में महान सिनेमेटोग्राफर वी.के. मूर्ति को दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया था। यह पुरस्कार उन्हें वर्ष 2008 के लिए दिया गया था और वह इस सम्मान को पाने वाले पहले सिनेमेटोग्राफर बने।

भारत दुनिया में फिल्म निर्माण की संख्या के मामले में पहले स्थान पर है। हर फिल्म के पीछे निर्देशक, अभिनेता के साथ-साथ तकनीकी टीम का बड़ा योगदान होता है, जिसमें सिनेमेटोग्राफर की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। वे ही फिल्म की रोशनी, दिशा, फ्रेमिंग और दृश्यों की खूबसूरती तय करते हैं।

दादा साहब फाल्के पुरस्कार की शुरुआत साल 1969 में हुई थी, जो भारतीय सिनेमा में विशेष योगदान के लिए दिया जाता है। लेकिन इतने वर्षों में पहली बार किसी सिनेमेटोग्राफर को यह सर्वोच्च सम्मान मिला, जब वी.के. मूर्ति को चुना गया। वी.के. मूर्ति का नाम पुरानी पीढ़ी के सिने प्रेमियों के लिए बहुत जाना-पहचाना है। वह मशहूर निर्देशक गुरु दत्त के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे। 1950 के दशक में उन्होंने गुरु दत्त की क्लासिक ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों को अपनी कमाल की छायांकन कला से अमर बना दिया। वी के मूर्ति की फिल्मों की लिस्ट में ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चांद’ और ‘साहिब बीवी और गुलाम’।

इन फिल्मों में उनकी रोशनी और कैमरा तकनीक आज भी सिनेमा के छात्रों के लिए मिसाल है। हालांकि, वी.के. मूर्ति को यह सम्मान मिलने में काफी लंबा इंतजार करना पड़ा, लेकिन उनकी मेहनत और योगदान को आखिरकार वह पहचान मिली जो वे हकदार थे। यह घटना भारतीय सिनेमा में तकनीकी कलाकारों के महत्व को सामने लाती है।