सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग एक्ट के तहत अनिवार्य मध्यस्थता को चुनौती देने वाली याचिका पर दिया नोटिस

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नई दिल्ली, 19 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में मुआवजे के निर्धारण के लिए अनिवार्य मध्यस्थता कार्यवाही को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट विचार करने के लिए सहमत हो गया है।

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने मामले में केंद्र सरकार, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के परियोजना निदेशक और अन्य को नोटिस जारी किया।

याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 3जी में भूमि खोने वाले पर पूर्व-निर्धारित मध्यस्थ के साथ अनिवार्य मध्यस्थता कार्यवाही थोपना संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है।

वकील मधुस्मिता बोरा के माध्यम से दायर रिट याचिका में धारा 3जे की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही फैसले में इसे असंवैधानिक और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन घोषित कर दिया है।

वर्तमान राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत, यदि सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित मुआवजे की राशि भूमि मालिक को स्वीकार्य नहीं है, तो धारा 3 जी (5) के तहत एक आवेदन दिया जा सकता है जो केवल मध्यस्थ को मुआवजे की राशि निर्धारित करने का अधिकार देता है।

साथ ही, मुआवजे के विवाद को अदालतों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया है, जिससे भूमि खोने वाले पर अनिवार्य मध्यस्थता कार्यवाही थोप दी जाती है।

याचिका में कहा गया है कि मध्यस्थ को केंद्र सरकार नियुक्त करती है और वो एक सरकारी कर्मचारी होता है। जाहिर तौर पर पक्षपाती है क्योंकि भूमि सरकार द्वारा इसके उपयोग के लिए अधिग्रहित की जाती है।

याचिका में कहा गया है, “परिणामस्वरूप, राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 के तहत भूमि खोने वाले को पूर्व-निर्धारित मध्यस्थ के साथ अनिवार्य/वैधानिक मध्यस्थता के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिसमें अदालतों का कोई सहारा नहीं होता है।”

याचिका में कहा गया है कि भूमि-हारने वाले को अनिवार्य वैधानिक मध्यस्थता से गुजरने के लिए मजबूर करना अनुचित है, जिसमें मध्यस्थ की नियुक्ति गैर-सहमति वाली होती है और केंद्र सरकार के पक्ष में होती है। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 29 जनवरी को सुनवाई किये जाने की संभावना है।

–आईएएनएस

एफजेड/एसकेपी