नई दिल्ली, 14 जून (आईएएनएस)। 15 जून 1937 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में जन्मे किसान बाबूराव हजारे को आज दुनिया अन्ना हजारे के नाम से जानती है। वह एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने कई सामाजिक सुधारों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया है।
उनके आंदोलनों ने ग्रामीण इलाकों के विकास, सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार एवं उससे जुड़ी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखने में अहम भूमिका निभाई है। उनका सबसे चर्चित काम ‘जन लोकपाल बिल’ को लाना था। इस बिल में भारत में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच के लिए एक लोकपाल की नियुक्ति करने और भ्रष्टाचार-रोधी कानून बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।
अन्ना हजारे ने 1991 में ‘भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन’ की शुरुआत की। उनका मानना था कि सरकारी गोपनीयता ही भ्रष्टाचार की जननी है।
उन्होंने महाराष्ट्र में सूचना के अधिकार के लिए ऐतिहासिक संघर्ष शुरू किया। जुलाई 2003 के उनके आमरण अनशन ने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर किया और यही आंदोलन आगे चलकर केंद्र के राष्ट्रीय ‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005’ का आधार बना। इस जंग में अन्ना हजारे को यरवदा जेल भी जाना पड़ा।
5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर पर इस बुजुर्ग ने ‘जन लोकपाल विधेयक’ के लिए आमरण अनशन शुरू किया। जब सरकार ने अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा, तो देश की सड़कें ‘मैं भी अन्ना हूं’ की टोपियों और तिरंगों से पट गईं।
रामलीला मैदान में 13 दिनों के अनशन ने देश की संसद को ‘सेंस ऑफ द हाउस’ प्रस्ताव पारित करने पर विवश किया, जिसके परिणामस्वरूप 1 जनवरी 2014 को ‘लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम’ लागू हुआ।
आंदोलन के बाद जहां उनके साथियों ने चुनावी राजनीति की राह चुनी, वहीं अन्ना हजारे अपनी वैचारिक शुचिता पर अडिग रहे। उन्होंने हमेशा खुद को दलगत राजनीति से दूर रखा। 2015 में भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ किसानों के हक में खड़े होना हो, या दिल्ली की आबकारी नीति पर अपनी ही पुरानी टीम के नीतिगत भटकाव की तीखी आलोचना करना, अन्ना हजारे ने साबित किया कि उनके लिए नैतिक मूल्य हमेशा सत्ता से ऊपर हैं।
आज पद्म भूषण और वैश्विक पुरस्कारों से सम्मानित अन्ना हजारे महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में अपने पैतृक गांव रालेगन सिद्धि के संत यादवबाबा मंदिर से सटे एक छोटे से कमरे में बेहद सादा जीवन व्यतीत करते हैं।

