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गोपालगंज : महासप्तमी पर थावे दुर्गा मंदिर में लगा भक्तों का तांता, एसपी ने सुरक्षा व्यवस्था का लिया जायजा

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गोपालगंज, 17 अक्टूबर (आईएएनएस)। शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी पर थावे दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता देखने को मिला। इसे देखते हुए एसपी विनय तिवारी ने अपनी पूरी टीम के साथ मंदिर परिसर में सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया और अधिकारियों को सुरक्षित दर्शन और बेहतर भीड़ प्रबंधन के निर्देश दिए।

एसपी विनय तिवारी ने कहा, “हम लोग अपनी पूरी टीम के साथ यहां निरीक्षण करने आए हैं। अगले चार दिन श्रद्धालुओं के लिए थावे मंदिर में क्या व्यवस्था रहेगी, उसका हमने निरीक्षण किया। जो भी थोड़ी-बहुत खामियां दिखीं, उन्हें सुधारने पर जोर दिया है ताकि श्रद्धालुओं को किसी तरह की दिक्कत न हो। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं, कल से पूरा सिस्टम स्मूथली ऑपरेट करेगा। पार्किंग की भी व्यवस्था बनाई गई है। लोगों को बीच-बीच में गाइड करने के लिए बोर्ड भी लगे हुए हैं। श्रद्धालुओं को सुलभ दर्शन कराने के लिए पूरा इंतजाम किया गया है।”

दरअसल, बिहार के गोपालगंज शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित थावे भवानी मंदिर को एक जाग्रत शक्तिपीठ माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार करीब 400 साल पहले यहां चेरो वंश के राजा मनन सिंह का शासन था। राजा खुद को मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानता था और उसे अपनी भक्ति पर बहुत घमंड था। उसी दौरान राज्य में भयानक अकाल पड़ा। थावे जंगल में मां का एक गरीब परम भक्त रहषु भगत रहता था। अकाल के दौरान रहषु भगत ने मां की आराधना की। मान्यता है कि उसकी भक्ति से वह दिन में बाघों के गले में सांप की रस्सी बांधकर जंगली घास की दवरी करता था और रात में उसी घास से चमत्कार से चावल निकलता था, जिसे वह जनता में बांट देता था।

जब यह खबर राजा तक पहुंची तो उसका अहंकार जाग गया। राजा ने रहषु को ढोंगी बताकर दरबार में बुलाया और आदेश दिया कि अपनी मां को महल में साक्षात बुलाकर दिखाए। रहषु ने बहुत मिन्नतें की और चेतावनी दी कि मां को हठ से बुलाना विनाश लाएगा, लेकिन राजा नहीं माना।

आखिर में रहषु ने देवी का ध्यान लगाया। कहा जाता है कि भक्त की पुकार सुनकर देवी मां असम के कामाख्या से चलीं। रास्ते में वह कोलकाता में दक्षिणेश्वर काली, पटना में पटन देवी और सारण-छपरा के आमी में अंबिका स्थान के रूप में रुकीं।

जैसे ही मां थावे पहुंचीं, राजा के महल ढहने लगे। भयानक गर्जना हुई और रहषु भगत का मस्तक बीच से फट गया। उसी फटे हुए मस्तक से देवी मां का एक हाथ बाहर निकला, जिसकी कलाई में दिव्य कंगन चमक रहा था। उसी समय राजा की मृत्यु हो गई और रहषु को मोक्ष मिला। मां उसी जगह स्थापित हो गईं। आज भी वहां मनन सिंह के महल के खंडहर मौजूद हैं।

इस मंदिर की खास बात है कि यहां भक्त पहले रहषु भगत के मंदिर में दर्शन करते हैं, फिर मां भवानी के। मान्यता है कि रहषु की पूजा के बिना मां की पूजा अधूरी है। नेपाल, यूपी और बंगाल समेत देश-विदेश से लाखों भक्त यहां आते हैं और नवरात्रि में यहां मेले में मां को पिड़किया का प्रसाद चढ़ाया जाता है।