पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत का कांग्रेस ने किया स्वागत, कहा- न्याय की लौ अब भी जिंदा

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नई दिल्ली, 1 मई (आईएएनएस)। कांग्रेस पार्टी ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश की सराहना की, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा को अग्रिम जमानत दी गई है। यह जमानत असम पुलिस द्वारा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी की शिकायत पर दर्ज की गई एफआईआर के संबंध में दी गई है।

कांग्रेस के संचार प्रभारी जयराम रमेश और पार्टी सांसद डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस बात पर जोर देता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और गिरफ्तारी कोई सामान्य कदम नहीं, बल्कि अंतिम उपाय होनी चाहिए, विशेष रूप से मानहानि के कथित मामलों में।

पवन खेड़ा के वकील डॉ. सिंघवी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उस कानूनी सिद्धांत को और मजबूत करता है कि किसी भी गिरफ्तारी को ट्रिपल टेस्ट, भागने का जोखिम, सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने के आधार पर ही सही ठहराया जाना चाहिए। ऐसा न होने पर हिरासत में लेने की कार्रवाई अपमान, उत्पीड़न और राजनीतिक फायदा उठाने का एक जरिया बनने का जोखिम पैदा कर देती है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कांग्रेस इस नतीजे का जश्न नहीं मना रही है, बल्कि इससे सीख ले रही है।

यह दावा करते हुए कि सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत ने देश की न्यायपालिका में उनके विश्वास को और मजबूत किया है, जयराम रमेश ने कहा कि इससे यह साबित होता है कि हमारे देश में न्याय की लौ अब भी पूरी तरह से जिंदा है।

डॉ. सिंघवी ने आगे कहा कि यह मामला कई न्यायिक मंचों से होकर गुजरा, असम के कामरूप जिले की मजिस्ट्रेट अदालत से लेकर तेलंगाना हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, गुवाहाटी हाई कोर्ट और फिर वापस शीर्ष अदालत तक, लेकिन अंत में न्यायपालिका ने अन्याय से सुरक्षा प्रदान की।

उन्होंने बताया कि खेड़ा की गिरफ्तारी के लिए असम सरकार की याचिका मनगढ़ंत, अटकलों पर आधारित और बेबुनियाद थी। इसे एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने खारिज कर दिया था। यह इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे निचली न्यायपालिका कार्यपालिका की मनमानी से सुरक्षा करती है।

उन्होंने कहा कि लगाए गए ज्यादातर आरोप बेलेबल थे। उन्होंने यह भी दलील दी कि कस्टडी में पूछताछ की अर्जी गैर-जरूरी थी। एंटीसिपेटरी बेल और बेगुनाही के अंदाजे पर बने हुए कानून के खिलाफ थी।

सिंघवी ने कहा कि फैसले में यह माना गया है कि ये बातें एक पॉलिटिकल कैंपेन के दौरान की गई थीं और डेमोक्रेटिक सिस्टम को बोलने की आजादी बनाए रखने के लिए पॉलिटिकल बोलने की आजादी देनी चाहिए।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयानों की भी आलोचना की और उन्हें असंसदीय और नामंजूर बताया। उन्होंने कहा कि इससे संवैधानिक नियमों के खत्म होने का खतरा है।

उन्होंने असम के मुख्यमंत्री से अपने अंदर झांकने और अपनी भाषा पर गौर करने की भी अपील की और उम्मीद जताई कि सरमा इसके लिए माफी नहीं तो अफसोस जरूर जताएंगे और कहा कि इससे उनका और पूरे डेमोक्रेटिक स्टैंडर्ड ही ऊपर उठेंगे।

उन्होंने यह भी बताया कि सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट में विवादित बयानों का बचाव नहीं किया और इसे कार्रवाई का एक अहम पहलू बताया।