नई दिल्ली, 13 जून (आईएएनएस)। दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को 2020 के दंगों से जुड़ी बड़ी साजिश के मामले में शरजील इमाम और उमर खालिद की ओर से दायर नई जमानत याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है।
कोर्ट ने जमानत याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और दिल्ली पुलिस को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 4 जुलाई को होगी।
दोनों आरोपियों ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और अन्य दंडात्मक प्रावधानों के तहत दर्ज मामले में नियमित जमानत याचिकाएं दायर की हैं।
अपनी याचिका में शरजील इमाम ने कहा कि जनवरी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी जमानत अर्जी खारिज किए जाने के छह महीने से ज्यादा समय बीतने के बावजूद, मुकदमे में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। अर्जी में कहा गया है कि आरोप तय करने के सवाल पर बहस अभी पूरी नहीं हुई है और इमाम इस मामले में लगभग छह साल से जेल में बंद हैं।
खालिद ने भी ट्रायल कोर्ट में नियमित जमानत की मांग की है। दोनों अर्जियों पर एक साथ सुनवाई हुई, जिसके बाद कोर्ट ने दिल्ली पुलिस का पक्ष जानना चाहा।
इस साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने खालिद और इमाम की जमानत अर्जियां खारिज कर दी थीं। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से प्रथम दृष्टया ऐसे आधार सामने आए हैं, जिनके कारण यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत जमानत देने पर कानूनी रोक लागू होती है।
इसी दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पांच अन्य आरोपियों, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद, को जमानत दे दी।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को छह महीने की अंतरिम ज़मानत दी। साथ ही, कोर्ट ने एक बड़ी बेंच को यह सवाल भी भेजा कि क्या यूएपीए की धारा 43डी(5) में दी गई पाबंदियों के बावजूद, लंबे समय तक जेल में रहने और ट्रायल में देरी के आधार पर जमानत दी जा सकती है।
यह देखते हुए कि सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों ने ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब’ मामले में तीन जजों की बेंच के फैसले की व्याख्या पर अलग-अलग राय जाहिर की थी, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के सामने रखे ताकि इसके लिए एक उचित बेंच बनाई जा सके।
यह आदेश तब आया जब दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलील दी कि यूएपीए और एनआईए एक्ट जैसे कड़े कानूनों के तहत जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते समय, सुप्रीम कोर्ट की समान स्तर की बेंचों द्वारा केए नजीब मामले के फैसले को लागू करने के तरीके में अंतर दिखाई दे रहा था।
जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने ‘सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए)’ मामले के बाद के फैसले पर भी ध्यान दिया। उस मामले में एक अन्य समान स्तर की बेंच ने उस फैसले के कुछ पहलुओं पर सवाल उठाए थे, जिसमें दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मामले में पांच अन्य आरोपियों को राहत देते हुए खालिद और इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
अभियोजन पक्ष के मामले की खूबियों पर कोई टिप्पणी किए बिना सुप्रीम कोर्ट ने अहमद और सैफ़ी को छह महीने की अंतरिम जमानत दे दी। कोर्ट ने माना कि वे काफी समय तक जेल में रह चुके हैं और मुकदमे के जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है।

