नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को सरकार को निर्देश दिया कि वह भीड़ को नियंत्रित करने और विरोध-प्रदर्शनों को संभालने के काम में तैनात दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों के लिए बॉडी कैमरों का इस्तेमाल अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को एक ‘रिप्रेजेंटेशन’ (यानी सरकार के सामने रखी गई मांग) के तौर पर ले।
एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस अरुण भारद्वाज की बेंच ने सरकार को निर्देश दिया कि वह विरोध-प्रदर्शनों और भीड़ को काबू करने के ऑपरेशन के दौरान पुलिस और आरएएफ कर्मियों द्वारा बॉडी कैमरों के इस्तेमाल के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) बनाने पर छह महीने के भीतर फैसला ले।
हाई कोर्ट ने यह आदेश वकील चाहत राघव द्वारा दायर एक पीआईएल का निपटारा करते हुए दिया। यह पीआईएल जंतर-मंतर पर जुलाई 2026 में हुए प्रदर्शनों के बाद दायर की गई थी, जिसमें कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक शामिल थे।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील अखिल सिबल ने कहा कि दिल्ली पुलिस का मौजूदा सिस्टम बाहरी वीडियोग्राफरों पर निर्भर है, जो घेरे के बाहर तैनात होते हैं और इसमें भीड़ को काबू करने के लिए तैनात कर्मियों की गतिविधियों की साथ-साथ रिकॉर्डिंग का कोई सही तरीका नहीं है।
उन्होंने तर्क दिया कि बॉडी कैमरों के लिए टेक्नोलॉजी की उपलब्धता भीड़ को काबू करने के ऑपरेशन के दौरान पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जवाबदेही तय करने में बहुत मददगार साबित हो सकती है।
सीनियर वकील ने तर्क दिया, “अगर टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, तो जरूरत पड़ने पर जवाबदेही तय करने में यह बहुत काम आ सकती है। यह फेशियल रिकग्निशन से अलग है, जिसमें निगरानी (सर्विलांस) को लेकर चिंताएं होती हैं।”
केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि याचिका को एक रिप्रेजेंटेशन (अनुरोध) के तौर पर माना जा सकता है और छह महीने के भीतर फैसला बता दिया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले और दिल्ली हाई कोर्ट के नियमों का हवाला देते हुए एएसजी शर्मा ने कहा कि पीआईएल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से पहले संबंधित अधिकारियों के सामने एक रिप्रेजेंटेशन देना जरूरी था।
केंद्र ने यह भी कहा कि विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए पहले से ही गाइडलाइंस मौजूद हैं और मौजूदा सिस्टम में वीडियोग्राफी भी शामिल है। याचिकाकर्ता बॉडी कैमरों के इस्तेमाल के लिए एसओपी बनाने की मांग करते हुए एक रिप्रेजेंटेशन दे सकता है, जिस पर कानून के अनुसार विचार किया जा सकता है।
सरकार द्वारा इस मुद्दे पर रिप्रेजेंटेशन के तौर पर विचार करने और छह महीने के भीतर अपना फैसला बताने पर सहमत होने के बाद, हाई कोर्ट ने पीआईएल का निपटारा कर दिया।
यह याचिका जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई झड़पों के बाद दायर की गई थी, जिसमें छात्र प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ 50 से ज्यादा पुलिस और पैरामिलिट्री कर्मी घायल हो गए थे।
