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दिल्ली विवि और कॉलेज छात्रसंघ चुनावों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण की मांग पर हाई कोर्ट का नोटिस

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नई दिल्ली, 2 सितंबर (आईएएनएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) और डीयूएसयू चुनाव के मुख्य चुनाव अधिकारी को नोटिस जारी किया। याचिका में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ और कॉलेज छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की गई है।

मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता शबाना हुसैन की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई नवंबर में तय की है।

याचिका में मांग की गई है कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ और कॉलेज छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं के लिए रोटेशन के आधार पर 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएं।

याचिका में कहा गया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्राओं की संख्या काफी अधिक होने के बावजूद छात्र राजनीति और निर्वाचित छात्र निकायों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनावों में धनबल, बाहुबल, हिंसा और अन्य अनियमितताओं के कारण कई छात्राएं चुनाव लड़ने और सक्रिय रूप से भाग लेने से हिचकिचाती हैं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि छात्राओं से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे, जैसे यौन उत्पीड़न, सुरक्षा और छात्रावासों के कर्फ्यू समय, छात्र राजनीति में पर्याप्त रूप से नहीं उठाए जाते।

याचिका में कहा गया है कि “राजनीतिक भागीदारी केवल मतदान के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्णय लेने और नीतियां बनाने की प्रक्रिया में सार्थक प्रतिनिधित्व भी इसका हिस्सा है।”

अधिवक्ता आशु बिधूड़ी के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि केवल महिलाओं को चुनाव लड़ने की अनुमति देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक समानता तभी संभव है जब उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी मिले।

याचिका में यह भी कहा गया है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर के प्रशासन में छात्राओं की अधिक भागीदारी भविष्य की महिला नेताओं को तैयार करने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी है।

याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का भी हवाला दिया है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। याचिका में कहा गया है कि महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का यह सिद्धांत छात्र राजनीति में भी लागू होना चाहिए।

याचिका में उत्तराखंड सरकार के उस फैसले का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें राज्य के विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य किया गया है।

इसमें दावा किया गया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध कई कॉलेजों और दिल्ली के बाहर के कुछ शिक्षण संस्थानों में भी छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था है।

याचिका में लिंगदोह समिति की सिफारिशों का भी जिक्र किया गया है। समिति का गठन छात्रसंघ चुनावों में धनबल और बाहुबल के प्रभाव को कम करने के लिए किया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन मानकों का लगातार उल्लंघन होने से चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और समावेशिता प्रभावित हुई है।

शबाना हुसैन ने इससे पहले भी विभिन्न अधिकारियों को ज्ञापन देकर छात्राओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग की थी। याचिका के अनुसार, उन्होंने अक्टूबर 2023 में दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन और बाद में 2024 में केंद्र सरकार तथा अन्य विश्वविद्यालय अधिकारियों को प्रतिनिधित्व भेजा था।

यह जनहित याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा 13 अगस्त 2026 को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव की अधिसूचना जारी करने के बाद दायर की गई है।

इस मामले का इतिहास पहले भी दिल्ली हाई कोर्ट में रहा है। सितंबर 2024 में हाई कोर्ट ने इसी तरह की एक याचिका पर सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार किया था, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय को शबाना हुसैन के आवेदन पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया था।

तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन की अध्यक्षता वाली पीठ ने विश्वविद्यालय प्रशासन को आवेदन पर फैसला लेने और चुनाव प्रक्रिया के दौरान छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का मौखिक निर्देश दिया था।

पहली याचिका में कहा गया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय में करीब 53 प्रतिशत छात्राएं हैं, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ और कॉलेज छात्रसंघों में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

याचिका में यह भी कहा गया था कि महिलाओं के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के अभाव में यौन उत्पीड़न, छात्रावास कर्फ्यू समय और सुरक्षा जैसे मुद्दों को छात्रसंघ चुनावी घोषणापत्रों में पर्याप्त महत्व नहीं मिल पाता।

वर्ष 2017 में दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज छात्रसंघ की उपाध्यक्ष रह चुकी शबाना हुसैन ने छात्र राजनीति में लैंगिक समानता और महिलाओं की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अदालत से निर्देश देने की मांग की है।