तिरुवनंतपुरम, 15 मई (आईएएनएस)। केरल की राजनीति में वीडी सतीशन की मजबूत पकड़ के साथ, कांग्रेस खेमे में जश्न का माहौल अब कहीं अधिक जटिल और राजनीतिक रूप से विस्फोटक मंत्रिमंडल गठन की प्रक्रिया में तब्दील हो रहा है।
यदि मुख्यमंत्री का चयन करने में ही 10 दिनों की गहन बातचीत और सावधानीपूर्वक संतुलन की आवश्यकता पड़ी, तो मंत्री पदों के लिए चल रही लड़ाई सतीशन और कांग्रेस उच्च कमान दोनों के लिए और भी कठिन परीक्षा साबित होने वाली है।
कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटों के साथ शानदार जीत हासिल की है, लेकिन सत्ता बंटवारे का गणित जीत के जश्न पर पहले से ही गहरा असर डाल रहा है। इन 102 सीटों में से अकेले कांग्रेस के पास प्रभावशाली 63 विधायक हैं।
फिर भी, इतनी संख्या होने के बावजूद पार्टी अपने महत्वाकांक्षी चेहरों में से कुछ को भी जगह नहीं दे पा रही है।
केरल मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री समेत अधिकतम 21 सदस्यों की ही संवैधानिक सीमा है, ऐसे में गठबंधन सहयोगियों के बीच सीटों के बंटवारे और स्पीकर के पद को अलग रखने के बाद कांग्रेस को लगभग एक दर्जन पद ही मिलने की उम्मीद है।
केरल की गठबंधन राजनीति में हमेशा की तरह मंत्रिमंडल का गठन केवल वरिष्ठता या प्रदर्शन पर आधारित नहीं होता।
हर पद के लिए क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, जातिगत समीकरण, धार्मिक संतुलन, सामुदायिक प्रभाव और गुटीय मजबूरियों जैसे जटिल कारकों को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाता है। इस बार, मंत्री पद के लिए उम्मीदवारों की कतार असाधारण रूप से लंबी है।
वरिष्ठ नेताओं में रमेश चेन्निथला, थिरुवनचूर राधाकृष्णन, सनी जोसेफ, के. मुरलीधरन, एपी अनिल कुमार और एन. सक्तन शामिल हैं। ये सभी प्रशासनिक अनुभव और मजबूत गुटीय समर्थन वाले दिग्गज नेता हैं।
इसके बाद महत्वाकांक्षी युवा और मध्यम पीढ़ी के नेताओं का गुट आता है, जिसमें आईसी बालकृष्णन, एम. विंसेंट, रोजी एम. जॉन, पीसी विष्णुनाथ, टीजी विनोद, मैथ्यू कुझलनादन, वीटी बलराम, चांडी ओम्मन, और एम. लिजू शामिल हैं।

