तिरुवनंतपुरम, 17 अक्टूबर (आईएएनएस)। केरल सरकार ने राज्य वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के प्रदेश उपाध्यक्ष एम.सी. मायिन हाजी को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया है। इस राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण फैसले से राज्य में मुस्लिम संगठनों के बीच समीकरण बदलने की संभावना है।
नौ सदस्यीय नए बोर्ड ने के.एस. हम्सा की अध्यक्षता वाली समिति की जगह ली है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार ने इस साल मार्च में हम्सा की अध्यक्षता में बोर्ड का गठन किया था।
यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब बोर्ड का कार्यकाल अभी साढ़े चार साल से अधिक बचा हुआ था। वहीं, बोर्ड को भंग किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली हम्सा की याचिका केरल हाईकोर्ट में लंबित है।
राज्य सरकार ने इससे पहले हाईकोर्ट को बताया था कि बोर्ड का पुनर्गठन जरूरी है। सरकार ने इसके पीछे कई सदस्यों के निर्धारित योग्यता मानदंडों को पूरा नहीं करने का हवाला दिया था। अदालत ने मौजूदा बोर्ड के नीतिगत फैसले लेने पर प्रतिबंध भी लगाया था, जिससे उसके कामकाज पर असर पड़ा। हालांकि, गठन के कुछ ही महीनों के भीतर पूरे बोर्ड को अचानक भंग कर नए सिरे से गठन किए जाने के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं।
मायिन हाजी मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता हैं और उन्हें वक्फ बोर्ड के सदस्य के रूप में काम करने का पूर्व अनुभव भी है। उनकी नियुक्ति को मुस्लिम लीग के नेतृत्व के लिए स्वीकार्य विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इससे बोर्ड के कामकाज को लेकर मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के कुछ वर्गों के साथ सरकार के तनाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
समस्ता ई.के. धड़े की मुशावरा से हाल ही में निष्कासित किए गए मुस्तफाल फैजी को भी नए बोर्ड में शामिल किया गया है। उनकी नियुक्ति को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे समस्ता के भीतर असहमति रखने वाले नेताओं के प्रतिनिधित्व को लेकर बहस छिड़ने की संभावना है।
विधायकों का प्रतिनिधित्व विधायक कुरुक्कोली मोइदीन करेंगे। नई समिति में विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है।
गौरतलब है कि जमात-ए-इस्लामी को पहली बार वक्फ बोर्ड में प्रतिनिधित्व मिला है। वहीं, कंथापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार के नेतृत्व वाले ए.पी. सुन्नी धड़े को बोर्ड में जगह नहीं मिली है।
बताया जा रहा है कि सरकार वक्फ बोर्ड के पूर्व सदस्य उमर फैजी मुक्कम से भी नाराज थी। वह मुतवल्लियों के प्रतिनिधि थे। सार्वजनिक रूप से वामपंथी राजनीति के प्रति झुकाव जाहिर करने और नीतिगत मुद्दों पर सरकार से मतभेदों के कारण उनकी भूमिका को लेकर असंतोष था।
बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति फिलहाल टाल दी गई है। इस संबंध में उनके प्रतिनिधित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले में फैसले का इंतजार किया जा रहा है।
नए बोर्ड का भविष्य केरल हाईकोर्ट में हम्सा की याचिका पर आने वाले फैसले पर भी निर्भर कर सकता है। इस पुनर्गठन से राज्य सरकार के सामने एक नया कानूनी और राजनीतिक मोर्चा खुल गया है। सरकार का उद्देश्य वक्फ बोर्ड को नीतिगत फैसले लेने और वक्फ संपत्तियों का प्रशासन करने में सक्षम बनाना है।
