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सूखाग्रस्त क्षेत्रों में चारे की कमी से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार की कार्ययोजना जारी

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मुंबई, 30 अक्टूबर (आईएएनएस)। अल नीनो के कारण हुई वर्षा की कमी से उत्पन्न सूखे की स्थिति से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 304 सूखाग्रस्त तालुकों में पशुओं के लिए चारे की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक कार्य योजना तैयार की है।

पशुपालन मंत्री पंकजा मुंडे ने शुक्रवार को घोषणा की कि जिला वार्षिक योजना निधि का कम से कम 5 प्रतिशत अब चारा उत्पादन, उपलब्ध चारे के संरक्षण और वैकल्पिक चारा स्रोतों के विकास के लिए आवंटित किया जाएगा।

अतिरिक्त उपायों में चारा बैंक स्थापित करना, जल-परागण और अजोला की खेती को बढ़ावा देना, अंतर-जिला चारा परिवहन को सुगम बनाना और पशु शिविरों के लिए डिजिटल प्रबंधन लागू करना शामिल है।

यह पहल राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले की अध्यक्षता वाली कैबिनेट उप-समिति के तहत राजस्व विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाले एक विशेषज्ञ समूह द्वारा की गई सिफारिशों के बाद की गई है।

उप-समिति ने 27 अक्टूबर को इन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया और आधिकारिक सरकारी संकल्प (जीआर) 30 अक्टूबर, 2026 को जारी किया गया।

सरकारी आदेश में कहा गया कि रबी ऋतु के लिए कम पानी की आवश्यकता वाली, बहु-कटाई वाली चारा फसलों के बीज महाबीज और अन्य उत्पादकों के माध्यम से उपलब्ध कराए जाएंगे। कृषि विश्वविद्यालय की भूमि, तालुका बीज गुणन केंद्रों और कृषि निगमों के भूखंडों के साथ-साथ पशुपालन विभाग के अधीन संस्थागत भूमि पर खेती की जाएगी।

विभागों के बीच समन्वय से गायरन (चारागाह), घास के मैदानों और बंजर या परती भूमि पर चारा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। जल संसाधन विभाग के सहयोग से गाद-बेड (गाल्पेरा) क्षेत्र किसानों और पशुपालकों को उपलब्ध कराए जाएंगे।

वन विभाग द्वारा घास की कटाई और भंडारण भी समय पर किया जाएगा। सरकारी आदेश के अनुसार, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), कंपनियों और गैर सरकारी संगठनों की मदद से जिला-वार चारा बैंक स्थापित किए जाएंगे।

लागत को नियंत्रित करने के लिए आधार मूल्य निर्धारित किए गए हैं (परिवहन शुल्क को छोड़कर): सूखे चारे के लिए अधिकतम 12 रुपए प्रति किलोग्राम और साइलेज के लिए 8 रुपए प्रति किलोग्राम। एक व्यापक अभियान के तहत पशुपालकों को कुशल कटाई, भंडारण, साइलेज निर्माण, यूरिया/एंजाइम उपचार और धान के भूसे के मूल्यवर्धन में प्रशिक्षित किया जाएगा।

हाइड्रोपोनिक्स, अजोला और बिना कांटों वाले कैक्टस की खेती जैसी वैकल्पिक तकनीकों को बढ़ावा दिया जाएगा, और पशु चिकित्सालयों में प्रायोगिक उत्पादन की योजना बनाई गई है।

पशु आहार को प्राथमिकता देने के लिए, पैकेजिंग, जैव ईंधन और बिजली उत्पादन जैसे औद्योगिक उद्देश्यों के लिए चारे का उपयोग प्रतिबंधित किया जाएगा। जिला कलेक्टरों को राज्य से बाहर चारे के परिवहन को कानूनी रूप से रोकने का अधिकार दिया गया है।

राज्य स्तरीय ऑनलाइन ‘पशु शिविर निगरानी और प्रबंधन प्रणाली’ पशु पंजीकरण, दैनिक उपस्थिति, चारा वितरण, पानी, पशु चिकित्सा देखभाल और खर्चों पर नजर रखेगी। शिविरों में बायोमेट्रिक या क्यूआर कोड उपस्थिति, भारत पशुधन प्रणाली के माध्यम से सत्यापन और चौबीसों घंटे सीसीटीवी निगरानी अनिवार्य होगी।