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महुआ मोइत्रा ने सीईसी के खिलाफ एफआईआर की मांग की, चुनावी अनियमितताओं का लगाया आरोप

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नई दिल्ली, 24 सितंबर (आईएएनएस)। तृणमूल कांग्रेस (ममता बनर्जी गुट) की सांसद महुआ मोइत्रा ने गुरुवार को कहा कि उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर एफआईआर दर्ज करने और जांच की मांग की है।

पुलिस स्टेशन के एसएचओ को लिखे पत्र में महुआ मोइत्रा ने पुलिस से मामला दर्ज करने, कथित अपराधों की जांच करने और इसमें शामिल सभी लोगों की भूमिका का पता लगाने की मांग की।

उन्होंने संबंधित गवाहों (जिनमें दोनों चुनाव आयुक्त भी शामिल हैं) से पूछताछ करने और सबूतों को कथित तौर पर नष्ट करने या उनमें हेरफेर किए जाने से बचाने के लिए उन्हें सुरक्षित रखने की भी मांग की।

मोइत्रा ने लिखा, “मैं अनुरोध करती हूं कि एफआईआर दर्ज कर अपराधों की जांच की जाए, इसमें शामिल प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका का पता लगाया जाए, दोनों चुनाव आयुक्तों समेत संबंधित गवाहों से पूछताछ की जाए और सबूतों को नष्ट करने या उनमें हेरफेर से बचाने के लिए बिना देरी उन्हें सुरक्षित किया जाए।”

कृष्णानगर से सांसद मोइत्रा ने एफआईआर दर्ज होने के बाद उसकी एक कॉपी मुफ्त में उपलब्ध कराने की भी मांग की।

मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए मोइत्रा ने आरोप लगाया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर उनकी जानकारी के बिना और उनकी राय के विपरीत लिए जा रहे फैसलों और जारी आदेशों पर कई बार आपत्ति जताई थी।

उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग का कामकाज संस्था को लेकर तय संवैधानिक और कानूनी नियमों से अलग दिशा में चला गया है।

मोइत्रा की शिकायत के मुताबिक, आयोग के भीतर जिम्मेदारियों के कथित बंटवारे को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इनमें दोनों चुनाव आयुक्तों से मतदाता सूचियों की निगरानी की जिम्मेदारी हटाए जाने का मुद्दा भी शामिल है।

मोइत्रा ने कहा, “मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने दोनों सहयोगियों की दर्ज राय के खिलाफ आयोग की ओर से काम करने का अधिकार नहीं है। उन्हें आयोग के नाम से ऐसे संदेश या आदेश जारी करने का भी कोई अधिकार नहीं है, जिन्हें आयोग ने कभी मंजूरी ही न दी हो।”

उन्होंने दावा किया कि अगर कोई दस्तावेज इस तरह तैयार किया जाता है कि ऐसा लगे कि उसे चुनाव आयोग के अधिकार से जारी किया गया है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है, तो वह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 335 के तहत फर्जी दस्तावेज की श्रेणी में आता है। उन्होंने कहा कि ऐसा दस्तावेज बनाना धारा 336 के तहत जालसाजी और उसे असली के रूप में इस्तेमाल करना धारा 340(2) के तहत दंडनीय है।

मोइत्रा ने आगे कहा कि मतदाता सूची एक सार्वजनिक रजिस्टर है। उन्होंने आरोप लगाया कि अगर किसी जीवित और अपने पते पर रह रहे मतदाता को जरूरी सत्यापन के बिना जानबूझकर अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत बताया जाता है तो यह उस रजिस्टर में जालसाजी है।

उन्होंने दावा किया कि ऐसी प्रत्येक एंट्री मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन से जुड़े आधिकारिक कर्तव्य का उल्लंघन भी है, जिसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत अलग अपराध माना गया है।

मोइत्रा ने यह भी आरोप लगाया कि निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत फॉर्म-6 में बदलाव किया गया और मतदाताओं से पुरानी मतदाता सूचियों के जरिए अपने माता-पिता से जुड़ी जानकारी साबित करने को कहा गया, जबकि इसके लिए नियमों में संबंधित संशोधन नहीं किए गए।

तृणमूल कांग्रेस नेता ने आगे दावा किया कि राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों को मतदाता सूचियों तक पूरी पहुंच नहीं दी गई।

मोइत्रा के मुताबिक, सबसे गंभीर आरोप उन सूचनाओं और आदेशों से जुड़ा है, जिन्हें कथित तौर पर पूरे चुनाव आयोग की मंजूरी के बिना भारत निर्वाचन आयोग के नाम से जारी किया गया।

मुख्य चुनाव आयुक्त पर मोइत्रा ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार ने अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना काम किया।