नई दिल्ली, 9 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारत में दक्षिण अफ्रीका के उच्चायुक्त अनिल सूकलाल ने शुक्रवार को भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नवनेथम “नावी” पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलने पर बधाई दी और उनकी उपलब्धि की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह सम्मान मानवाधिकार, न्याय और अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में नावी पिल्लै के लंबे और उल्लेखनीय योगदान की वैश्विक मान्यता है।
पिल्लै यह सम्मान पाने वाली पांचवीं दक्षिण अफ्रीकी और नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी महिला हैं।
सूकलाल ने कहा कि नावी पिल्लै अब उन प्रतिष्ठित दक्षिण अफ्रीकियों की सूची में शामिल हो गई हैं, जिसमें नेल्सन मंडेला, आर्कबिशप डेसमंड टूटू, अल्बर्ट लुथुली और एफ.डब्ल्यू. डी. क्लार्क जैसे नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शामिल हैं।
आईएएनएस से बातचीत में उन्होंने कहा, “यह दक्षिण अफ्रीकी समाज, अफ्रीका और कानून के शासन के मूल्यों के बारे में एक बहुत शक्तिशाली संदेश देता है। यह पुरस्कार उन असाधारण लोगों को सम्मानित करता है जिन्होंने अपना जीवन मानवता की सेवा के लिए समर्पित किया है। पिल्लै तमिल समुदाय से आती हैं। उनके माता-पिता और परदादा-परदादी 1890 के दशक में तमिलनाडु से अनुबंधित मजदूरों के रूप में दक्षिण अफ्रीका की चीनी बागानों में काम करने गए थे।”
उन्होंने कहा, “मुझे विशेष गर्व है, क्योंकि वह उसी इलाके से आती हैं, जहां मेरा जन्म और पालन-पोषण हुआ। उन्होंने उसी हाई स्कूल में पढ़ाई की, जहां मैंने शिक्षा प्राप्त की थी। आज हमारे समुदाय में जश्न का माहौल है, क्योंकि वह बेहद साधारण और संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि से उठकर यहां तक पहुंची हैं। उनकी शिक्षा के लिए स्थानीय समुदाय ने मिलकर आर्थिक मदद की थी और आज वह सार्वजनिक जीवन के सर्वोच्च पदों तक पहुंच चुकी हैं।”
डर्बन में भारतीय तमिल मूल के परिवार में जन्मी 85 वर्षीय नावी पिल्लै, दक्षिण अफ्रीका की हाईकोर्ट की पहली अश्वेत महिला न्यायाधीश बनी थीं। उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने में योगदान के लिए यह सम्मान दिया गया है।
सूकलाल ने बताया कि रंगभेद के दौर में पिल्लै ने स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। वह क्वाजुलु-नटाल में वकालत का अपना दफ्तर खोलने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। उन्होंने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस और अन्य मुक्ति आंदोलनों से जुड़े रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं का कानूनी बचाव भी किया। उनके पति को भी सक्रियता के कारण रंगभेदी शासन ने हिरासत में रखा था।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक दक्षिण अफ्रीका के गठन के बाद पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। वह रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में वरिष्ठ न्यायिक पद पर रहीं, हेग में न्यायाधीश के रूप में कार्य किया और बाद में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त भी बनीं। उन्होंने अपना पूरा जीवन मानवता के कल्याण और बेहतर दुनिया के निर्माण के लिए समर्पित किया।
उच्चायुक्त ने कहा कि यह पुरस्कार ऐसे समय में मिला है, जब दुनिया को मानवाधिकारों, बुनियादी स्वतंत्रताओं और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों की रक्षा की सबसे अधिक जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान नावी पिल्लै की बहुपक्षवाद, संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकारों के प्रति आजीवन प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है और दुनिया को एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।
सूकलाल ने कहा, “यह दक्षिण अफ्रीका के लिए गर्व की बात है कि हमारे पास अब पांच नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं। यह अपेक्षाकृत युवा लोकतंत्र के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह केवल दक्षिण अफ्रीका या अफ्रीका की कहानी नहीं है, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि असाधारण नेतृत्व वैश्विक दक्षिण और अफ्रीका से भी उभर सकता है।”
नावी पिल्लै ने 1967 में अपना लॉ फर्म शुरू किया था और रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं का कानूनी बचाव किया। 1973 में उन्होंने एक महत्वपूर्ण मुकदमा जीतकर नेल्सन मंडेला सहित रॉबेन द्वीप में बंद राजनीतिक कैदियों को वकीलों तक पहुंच और कुछ बुनियादी अधिकार दिलाने में सफलता हासिल की।
1995 में रंगभेद शासन के अंत के बाद उन्हें हाई कोर्ट में नियुक्त किया गया। 1999 में वह इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल फॉर रवांडा की न्यायाधीश और अध्यक्ष बनीं। वहां उन्होंने हुतू नेता जीन-पॉल अकायेसू के मुकदमे में यह स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि बलात्कार और यौन हिंसा को भी युद्ध अपराध माना जाएगा।
अंत में सूकलाल ने कहा, “मेरा मानना है कि नोबेल समिति ने जज पिल्लै को इस समय सम्मानित करके दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की है कि विभाजनों, संघर्षों और निर्दोष लोगों की मौतों को रोकने के लिए सामूहिक कार्रवाई की जरूरत है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता शांति है।”
