नई दिल्ली, 6 नवंबर (आईएएनएस)। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने शुक्रवार को ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहा बोरा माओवादी विचारधारा से प्रभावित हैं, और जिस संगठन से वह जुड़ी हैं, वह संविधान और लोकतंत्र का विरोध करता है।
निशिकांत दुबे ने आईएएनएस से बात करते हुए दावा किया कि संगठन के सदस्यों ने धारा 167 के तहत एक प्रस्ताव पारित किया है। इसमें कथित तौर पर संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं का विरोध किया गया है और सशस्त्र बल के जरिए सरकार बदलने की बात कही गई है।
उन्होंने आरोप लगाया, “ये सभी लोग उसी संगठन से जुड़े हैं जिससे नेहा बोरा जुड़ी हुई हैं। उन्होंने धारा 167 के तहत एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें कहा गया है कि वे संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ हैं और देश में सशस्त्र बल के जरिए सरकार बदलना चाहते हैं। वे चीन की ‘रेड आर्मी’ से प्रभावित हैं और एक माओवादी नेता हैं।”
विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों में कई कार्यकर्ताओं और सार्वजनिक हस्तियों की भागीदारी पर टिप्पणी करते हुए दुबे ने उन्हें ‘पेशेवर आंदोलनकारी’ बताया, जो अक्सर सरकारों और नीतियों के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में शामिल हो जाते हैं।
उन्होंने वकील प्रशांत भूषण, सीपीआईएम नेता वृंदा करात और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि वे राजनीतिक मुद्दों की परवाह किए बिना अक्सर विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हैं।
उन्होंने कहा, “जब भी कोई विरोध प्रदर्शन होता है तो ये लोग वहां जरूर दिखते हैं। परमाणु समझौते के खिलाफ विरोध हो या नर्मदा आंदोलन, ये सभी लोग वहां मौजूद थे। अगर कभी परमाणु संयंत्र बनता है तो आप देखेंगे कि यही लोग उसका विरोध कर रहे होंगे। इनमें से कुछ लोगों को विरोध प्रदर्शन करने की आदत सी हो गई है।”
दुबे ने कांग्रेस पर यह भी आरोप लगाया कि वह अपने राजनीतिक नैरेटिव के हिसाब से ऐतिहासिक घटनाओं की मनमानी व्याख्या करती है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस की राजनीति ने अक्सर पाकिस्तान के हितों को साधने का काम किया है।
7 नवंबर 1966 के ‘गो-हत्या विरोधी दंगों’ का जिक्र करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि कैसे संसद के बाहर एक विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर हजारों साधुओं की जान चली गई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस ने कभी इस घटना को लेकर अपनी जिम्मेदारी ठीक से स्वीकार की है।
उन्होंने इस घटना की जांच के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में बनी एक समिति में आरएसएस के पूर्व प्रमुख एम.एस. गोलवलकर की भूमिका का भी जिक्र किया। दुबे ने कहा, “आज कांग्रेस आरएसएस को गालियां देती है, लेकिन उस समय इंदिरा गांधी ने मामले की जांच करने वाली समिति के सदस्यों में तत्कालीन आरएसएस सरसंघचालक गोलवलकर जी को भी शामिल किया था। इससे साबित होता है कि उनके लिए हिंदू-मुस्लिम विवाद सिर्फ वोट-बैंक की राजनीति है, लेकिन जब उन्हें मदद की जरूरत होती है, तो वे आरएसएस से भी मदद मांगते हैं।”
उन्होंने विपक्ष के नेता राहुल गांधी को चुनौती दी कि वे बताएं कि अगर कांग्रेस आरएसएस को स्वीकार नहीं करती तो फिर गोलवलकर को उस समिति में क्यों शामिल किया गया था?
दुबे ने मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) पर कांग्रेस के रुख की भी आलोचना की। उन्होंने मतदाता सूची से मृत लोगों, एक ही व्यक्ति के दो बार दर्ज नामों और कथित विदेशी नागरिकों के नाम हटाए जाने का बचाव किया।
उन्होंने कहा, “इसे समझिए, एसआईआर के दौरान आपका नाम हटा दिया गया। मेरा नाम हटा दिया गया, लेकिन मेरे परिवार के किसी सदस्य, मेरे घरेलू सहायक या ड्राइवर का नाम नहीं हटाया गया है। किसी ने भी मुझसे आकर यह नहीं कहा कि उनका नाम हटाया जा रहा है। भारत के असली मतदाता तो यहीं रहेंगे।”
उन्होंने दावा किया कि बांग्लादेश से भारत में आकर बसने वाले चार करोड़ लोगों की पहचान की जा रही है, ताकि उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकें। उन्होंने आगे कहा कि इस पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत मृत मतदाताओं और एक ही व्यक्ति के दो बार दर्ज नामों को भी हटा दिया जाएगा।
कांग्रेस पर निशाना साधते हुए दुबे ने आरोप लगाया कि कश्मीर और चीन के साथ भारत की सीमा से जुड़े कई पुराने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय विवादों की जड़ें कांग्रेस सरकारों द्वारा लिए गए फैसलों में ही हैं।
टिपरा मोथा नेता प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देब बर्मा की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए उन्होंने पूर्व रियासत त्रिपुरा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि आजादी के समय लिए गए फैसलों की वजह से शाही परिवार से उचित सलाह लिए बिना ही हिंदू-बहुसंख्यक इलाकों को पाकिस्तान को सौंप दिया गया था।
