कोलकाता, 25 जुलाई (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल पंचायत (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2026, शनिवार को विधानसभा में भारी बहुमत से पारित हो गया। इसके पक्ष में 169 वोट पड़े और विपक्ष में केवल 13 वोट पड़े।
विधेयक के विरोध में पड़े 13 वोटों में से नौ वोट पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस विधायक दल के ‘मूल लेकिन अल्पसंख्यक’ गुट के विधायकों के थे। दो कांग्रेस विधायकों, एक सीपीआई (एम) विधायक और एक अखिल भारतीय धर्मनिरपेक्ष मोर्चा (एआईएसएफ) विधायक ने भी विधेयक का विरोध किया।
मतदान के दौरान कुल 32 विधायक अनुपस्थित थे। विधेयक 23 जुलाई को कोलकाता गजट में प्रकाशित हुआ था।
इस विधेयक का उद्देश्य पश्चिम बंगाल पंचायत अधिनियम, 1973 के कई प्रावधानों में संशोधन करना है, विशेष रूप से पंचायत व्यवस्था के तीनों स्तरों के निर्वाचित प्रमुखों के विधेयक स्वीकृति और हस्ताक्षर करने के अधिकार को काफी हद तक कम करना। इसका लक्ष्य प्रशासनिक स्थिरता, निर्बाध सार्वजनिक सेवा वितरण और ग्रामीण नागरिक निकायों के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करना है।
चर्चा में भाग लेते हुए पंचायत कार्य एवं ग्रामीण विकास मंत्री दिलीप घोष ने कहा कि विधेयक का उद्देश्य निर्वाचित पंचायत प्रमुखों के संवैधानिक अधिकारों को कम करना नहीं है।
उन्होंने कहा कि बल्कि, इसका उद्देश्य ग्रामीण नागरिक सेवाओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार और कमीशन के अधिकार को कम करना है। अब से, निर्वाचित पंचायत प्रमुख ही किसी भी प्रस्ताव को मंजूरी देंगे। लेकिन विधेयक को नौकरशाहों द्वारा ही स्वीकृत और अनुमोदित किया जाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि नए विधेयक का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक सेवाओं के लिए स्वीकृत धन का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए किया जाए।
उच्च शिक्षा मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय ने बहस में भाग लेते हुए कहा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल सरकार के पिछले 15 वर्षों में सहभागी पंचायत प्रणाली के बजाय वंशानुगत पंचायत प्रणाली विकसित हुई।
उन्होंने कहा कि आपने पंचायत प्रणाली को बर्बाद कर दिया। यही कारण है कि भ्रष्ट पंचायत प्रमुख अपने कार्यालयों में आना बंद कर चुके हैं। सार्वजनिक सेवा बाधित हो रही है। इस प्रणाली को बदलने की आवश्यकता है, और यह नया विधेयक इसी बदलाव को लाने के उद्देश्य से लाया गया है।

