केरल में नवीन बाबू मौत मामले की फिर होगी जांच? नई यूडीएफ सरकार ने दिए संकेत

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तिरुवनंतपुरम, 8 मई (आईएएनएस)। केरल में कांग्रेस नीत यूडीएफ की प्रचंड चुनावी जीत के बाद पूर्व कन्नूर अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) नवीन बाबू की रहस्यमयी मौत का मामला एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में लौटता दिख रहा है। संकेत मिल रहे हैं कि नई सरकार इस मामले में सीबीआई जांच या निष्पक्ष पुलिस अधिकारियों की विशेष टीम से नई जांच करा सकती है।

इस मुद्दे ने तब और तूल पकड़ लिया जब केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के महासचिव और रन्नी से नवनिर्वाचित विधायक पझकुलम मधु ने कहा कि नई कैबिनेट के गठन के तुरंत बाद इस मामले को प्राथमिकता के साथ उठाया जाएगा।

उन्होंने आईएएनएस से कहा, “जिस दिन यह घटना हुई थी, उसी दिन से मैं परिवार के साथ खड़ा हूं। अब नई सरकार बनने जा रही है, तो हम इस मामले को मजबूती से उठाएंगे। कांग्रेस नीत यूडीएफ लगातार सीबीआई जांच की मांग करती रही है। सरकार के शपथ लेने के बाद मैं और अन्य नेता इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएंगे।”

पझकुलम मधु उन नेताओं में शामिल रहे हैं जिन्होंने नवीन बाबू को न्याय दिलाने के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया था। उनका कहना है कि मामले में अब भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं और पहले की जांच भरोसा पैदा करने में विफल रही।

नवीन बाबू की मौत के बाद उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया था, जब सीपीआई(एम) की वरिष्ठ नेता और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष पीपी दिव्या ने एक विदाई समारोह के दौरान उन पर रिश्वत लेने के आरोपों को लेकर सार्वजनिक रूप से निशाना साधा था। यह आरोप प्रशांतन नामक व्यक्ति ने लगाए थे। बताया गया था कि दिव्या बिना निमंत्रण के कार्यक्रम में पहुंची थीं।

यूडीएफ और नवीन बाबू के परिवार ने लगातार आरोप लगाया है कि जांच एजेंसियों ने दिव्या और प्रशांतन के बीच संबंधों या कथित रिश्वत के लिए जुटाए गए पैसों के स्रोत की गंभीरता से जांच नहीं की।

मामले से जुड़े विवादित पेट्रोल पंप को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इसमें बेनामी लेनदेन और प्रभावशाली राजनीतिक संबंधों की भूमिका हो सकती है।

कांग्रेस नेताओं का मानना है कि पूरे प्रकरण के “असल मास्टरमाइंड” का पता केवल विस्तृत जांच से ही चल सकता है।

विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे की करारी हार के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नवीन बाबू मामला नई यूडीएफ सरकार की शुरुआती बड़ी परीक्षाओं में से एक बन सकता है।

सीपीआई(एम) के लिए यह मामला अब भी एक असहज छाया बना हुआ है, जिसे सत्ता परिवर्तन के बाद फिर से सार्वजनिक बहस के केंद्र में लाया जा सकता है।