नई दिल्ली, 12 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय भारी उद्योग एवं इस्पात मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने बुधवार को आरोप लगाया कि कर्नाटक सरकार ने कावेरी जल विवाद को गलत तरीके से संभाला और राज्य के कानूनी विशेषज्ञों को जरूरी जानकारी से दूर रखा है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार कर्नाटक के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त तैयारी करने में विफल रही है।
नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट और कावेरी से जुड़ी विभिन्न प्राधिकरणों और समितियों के सामने कर्नाटक का पक्ष रखने वाले वरिष्ठ वकीलों को राज्य सरकार उचित सम्मान नहीं दे रही है।
उन्होंने उन दावों का उल्लेख किया, जिनमें कहा गया कि वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन कटारकी को नई दिल्ली स्थित कर्नाटक भवन में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार द्वारा बुलाई गई कर्नाटक के सांसदों की बैठक में बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दी गई, जिसके बाद वह बैठक छोड़कर चले गए।
कुमारस्वामी ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में बेंगलुरु के कृष्णा कार्यालय में हुई सर्वदलीय बैठक में भी कानूनी विशेषज्ञों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
उन्होंने कहा, “जब इस तरह की बैठकें बुलाई जाती हैं तो उसमें कानूनी और तकनीकी पहलुओं को सभी के सामने रखा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री को बैठक की शुरुआत में ही कानूनी विशेषज्ञों की राय लेनी चाहिए थी। इस तरह विशेषज्ञों की अनदेखी करना दूरदर्शिता और तैयारी की कमी को दिखाता है।”
कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि कर्नाटक सरकार कावेरी जल संकट को संभालने में पूरी तरह असफल रही है, जबकि तमिलनाडु सतर्क रहा और कर्नाटक की चूकों का लाभ उठाता रहा।
उन्होंने बताया कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) और कावेरी जल विनियमन समिति (सीडब्ल्यूआरसी) दोनों ने कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को छोड़ने की सिफारिश की है।
कुमारस्वामी के अनुसार, तमिलनाडु ने मई महीने में ही कावेरी प्राधिकरणों के सामने अपना पक्ष रखा था, जबकि कर्नाटक को जून से पानी छोड़ना शुरू करना था।
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य की कानूनी लड़ाई को मजबूत करने के बजाय मुख्यमंत्री ने कावेरी और कृष्णा बेसिन के किसानों को अधिक पानी की जरूरत वाली फसलें न उगाने की सलाह दी।
उन्होंने कहा, “इसका नुकसान हमारे किसानों को हुआ। पानी की कमी के कारण पहले से बोई गई फसलें भी बर्बाद हो गईं।”
कुमारस्वामी ने सरकार की तैयारी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि कावेरी संकट से निपटने के लिए उसने संकटकालीन जल बंटवारा फॉर्मूला (डिस्ट्रेस शेयरिंग फॉर्मूला) तैयार करने की दिशा में क्या कदम उठाए हैं।
उन्होंने कहा कि इस फॉर्मूले पर अभी तक सुप्रीम कोर्ट का कोई अंतिम आदेश नहीं आया है और कर्नाटक को कावेरी प्राधिकरणों के समक्ष इसके लिए सक्रिय रूप से प्रयास करना चाहिए था।
उन्होंने सवाल किया, “मुख्यमंत्री बनने से पहले डीके शिवकुमार तीन साल तक जल संसाधन मंत्री थे। उस दौरान वे क्या कर रहे थे?”
राजनीतिक हमला करते हुए कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री कावेरी मुद्दे से ज्यादा कैबिनेट विस्तार और विभागों के बंटवारे को प्राथमिकता दे रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया, “कावेरी मुद्दे को छोड़कर वे मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणुगोपाल और रणदीप सिंह सुरजेवाला के घरों के चक्कर लगा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि शिवकुमार कर्नाटक के हितों से ज्यादा कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कुमारस्वामी ने आगे आरोप लगाया कि तमिलनाडु प्रशासनिक और कानूनी दोनों स्तरों पर अपने हितों को आगे बढ़ा रहा है, जबकि कर्नाटक सरकार सो रही है।
उन्होंने सरकार के इस दावे पर भी सवाल उठाया कि वह कर्नाटक के किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए पारदर्शी तरीके से तय करेगी कि तमिलनाडु को कितना पानी छोड़ा जाए।
उन्होंने कहा, “क्या पारदर्शिता का मतलब तमिलनाडु को पानी छोड़ना है? अगर बारिश और जलाशयों में पानी आने की वजह से अभी पानी छोड़ा जाता है तो आने वाले दिनों में क्या होगा?”
कुमारस्वामी ने राज्य सरकार से तमिलनाडु की संभावित कानूनी और प्रशासनिक रणनीतियों के लिए पहले से तैयारी करने की अपील की। उन्होंने कहा कि कर्नाटक को संकट आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से कदम उठाने चाहिए।

