Saturday, July 4, 2026
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उरुमची नरसंहार की उइगरों ने दिलाई याद, चीन के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई का आह्वान

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वाशिंगटन, 4 जुलाई (आईएएनएस)। कई उइगर समर्थक संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह बीजिंग पर दबाव बनाए ताकि वह वर्ष 2009 के ‘उरुमची नरसंहार’ के दौरान मारे गए, लापता हुए या जेल में डाले गए लोगों की वर्तमान स्थिति का खुलासा करे। यह घटना चीन के शिनजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र में हुई थी और इसकी 17वीं वर्षगांठ 5 जुलाई को है।

वर्षगांठ के अवसर पर वर्ल्ड उइगर कांग्रेस (डब्ल्यूयूसी) ने उन पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी, जिन्हें उसने चीनी सरकार की “शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई” का शिकार बताया।

डब्ल्यूयूसी के अनुसार, यह घटना 5 जुलाई 2009 को शुरू हुई थी, जब हजारों उइगर युवाओं ने शिनजियांग की राजधानी उरुमची में स्थित पीपुल्स स्क्वायर, उरुमची की ओर मार्च किया था। वे शाओगुआन क्षेत्र की उस घटना के खिलाफ विरोध कर रहे थे, जिसमें दो उइगरों की मौत कथित तौर पर चीनी फैक्ट्री श्रमिकों की भीड़ ने की थी। इसे “नस्लीय हमले” बताया गया था।

डब्ल्यूयूसी के अनुसार, इसके बाद 5 से 7 जुलाई 2009 के बीच शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हजारों उइगरों को मारा गया, लापता किया गया या घायल किया गया। वे समान अधिकारों और न्याय की मांग कर रहे थे।

डब्ल्यूयूसी के अध्यक्ष तुर्गुनजान अलाउदुन ने कहा, “हर 5 जुलाई को हम उइगर इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक को याद करते हैं। चीनी सरकार की हिंसक कार्रवाई ने दमन को और बढ़ाया और इससे ही आगे चलकर आज दिख रहे कथित उत्पीड़न की नींव पड़ी।”

संगठन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह पीड़ितों के बारे में पारदर्शिता की मांग जारी रखे, और आरोप लगाया कि वैश्विक जांच की कमी के कारण चीन की नीतियां बिना रोकटोक जारी हैं।

इसी तरह उइगर ह्यूमन राइट्स प्रोजेक्ट (यूएचआरपी) ने भी चीनी सरकार से 2009 की कार्रवाई के बाद मारे गए, लापता हुए और कैद किए गए लोगों की स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की।

यूएचआरपी ने कहा कि पीड़ित परिवारों की अपीलों के बावजूद चीनी अधिकारियों ने अब तक मृतकों, घायलों, हिरासत में लिए गए या लापता लोगों का कोई पारदर्शी रिकॉर्ड साझा नहीं किया है। कई परिवार आज भी अपने परिजनों के बारे में अनिश्चितता में जीवन जी रहे हैं।

यूएचआरपी के कार्यकारी निदेशक ओमर कानात ने कहा, “5 जुलाई की कार्रवाई चीन की उइगरों के खिलाफ नीति में एक निर्णायक मोड़ थी। इसके बाद हुई दंडमुक्ति ने व्यापक दमन, जबरन हिरासत, श्रम और पारिवारिक विभाजन जैसी स्थितियों को जन्म दिया।”