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आईआईटी दिल्ली ने विकसित किया पहला स्वदेशी माइक्रो-जीपीयू

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नई दिल्ली, 24 सितंबर (आईएएनएस)। आईआईटी दिल्ली ने देश का पहला काम करने वाला और प्रदर्शित किया जा सकने वाला स्वदेशी माइक्रो-जीपीयू तैयार किया है। ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट यानी जीपीयू आज के आधुनिक कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अहम हिस्सा बन चुके हैं। खासकर एआई और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों में इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। अब तक भारत में इस्तेमाल होने वाले जीपीयू के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भरता रही है।

इस निर्भरता को कम करने की दिशा में आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं ने की यह महत्वपूर्ण उपलब्धि है। आईआईटी दिल्ली के विद्युत अभियांत्रिकी विभाग की टीम ने इस माइक्रो-जीपीयू को विकसित किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, उनकी जानकारी में यह भारत के किसी विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया पहला कार्यशील और प्रदर्शित किया जा सकने वाला स्वदेशी माइक्रो-जीपीयू है। इसका इस्तेमाल कम लागत वाले उपकरणों में ग्राफिक्स और डिस्प्ले से जुड़े काम के लिए किया जा सकता है।

इस परियोजना का नेतृत्व एमटेक के छात्र नम्मी आकाश और एम. रवि तेजा ने किया। उन्हें प्रो. जयदेव और प्रो. कौशिक साहा ने मार्गदर्शन दिया। इसे स्पार्टन-7 एफपीजीए प्लेटफार्म पर सफलतापूर्वक लागू किया गया। आईआईटी दिल्ली के मुताबिक इस तकनीक की खासियत यह है कि इसे केवल बड़े और महंगे कंप्यूटरों तक सीमित रखने के बजाय कई छोटे और कम लागत वाले उपकरणों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उपयोग औद्योगिक नियंत्रण डिस्प्ले, कम लागत वाले मानव-मशीन इंटरफेस, ई-रिक्शा के डैशबोर्ड और नेविगेशन सिस्टम, छोटी मछली पकड़ने वाली नौकाओं के लिए अंतर्देशीय जलमार्ग नेविगेशन टर्मिनल और शैक्षणिक ई-बुक रीडर जैसे उपकरणों में किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि यह एक ऐसा प्रोग्राम किए जा सकने वाला ग्राफिक्स प्रोसेसर ढांचा है, जिसे जरूरत के अनुसार अलग-अलग उपकरणों में लगाया जा सकता है। इसे भविष्य में एएसआईसी यानी विशेष उद्देश्य के लिए तैयार चिप या एफपीजीए जैसे प्रोग्राम किए जा सकने वाले हार्डवेयर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। नम्मी आकाश और एम. रवि तेजा ने कहा कि उनका लक्ष्य एक ऐसा छोटा लेकिन वास्तविक रूप से प्रोग्राम किए जा सकने वाला ग्राफिक्स प्रोसेसिंग ढांचा बनाना था, जिसे एफपीजीए पर लागू किया जा सके और आगे चलकर चिप के रूप में विकसित किया जा सके। उनका कहना है कि ऐसे स्वदेशी हार्डवेयर सिस्टम किफायती डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करने में मदद कर सकते हैं और डिजिटल पहुंच की खाई को कम करने में योगदान दे सकते हैं।

आईआईटी दिल्ली की टीम अब इस तकनीक को अगले स्तर तक ले जाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत 8 से 16 कोर वाले वेक्टर शैली के ग्राफिक्स प्रोसेसर को विकसित करने की योजना है। इसके साथ बेहतर कंपाइलर और ग्राफिक्स सॉफ्टवेयर टूलचेन भी तैयार किया जाएगा। आगे चलकर 65 नैनोमीटर एएसआईसी प्रक्रिया पर इसका प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट तैयार करने की दिशा में भी काम किया जाएगा।

प्रो. जयदेव ने कहा कि यह परियोजना सस्ती और सामाजिक उपयोग वाली कंप्यूटिंग प्रणालियों के लिए स्वदेशी प्रोग्राम किए जा सकने वाले ग्राफिक्स हार्डवेयर की शिक्षा और शोध क्षमता को दिखाती है। उन्होंने बताया कि एक सामान्य एफपीजीए बोर्ड पर इस डिजाइन को साकार करने के लिए टीम को कई तकनीकी नवाचार करने पड़े।

टीम अब इस तकनीक के एएसआईसी विकास, सिस्टम एकीकरण और आगे व्यावसायिक उपयोग के लिए वित्तीय सहायता जुटाने की योजना बना रही है। अगर यह प्रयास आगे सफल होता है, तो छोटे और किफायती इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए भारत में ही विकसित ग्राफिक्स प्रोसेसिंग तकनीक का रास्ता और मजबूत हो सकता है।