जमशेदपुर, 16 अक्टूबर (आईएएनएस)। झारखंड के जमशेदपुर में नवरात्र के दौरान आयोजित डांडिया और गरबा नाइट कार्यक्रमों को लेकर विवाद गहरा गया है। आयोजनों में पहचान पत्रों की जांच, गैर-हिंदुओं की भागीदारी और धार्मिक परंपराओं की मर्यादा को लेकर धार्मिक संगठनों की आपत्तियों के बीच अब जमशेदपुर पश्चिमी के विधायक सरयू राय ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने डांडिया को हिंदुओं का धार्मिक उत्सव बताते हुए प्रशासन से ऐसे आयोजनों के सामाजिक सद्भाव पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार करने को कहा है। राय ने सोशल मीडिया पर जारी पोस्ट में कहा कि गरबा और डांडिया का सीधा संबंध नवरात्र और मां दुर्गा की उपासना से है। उन्होंने बताया कि कुछ लोग उनके पास डांडिया नाइट आयोजन की प्रशासनिक अनुमति के लिए पैरवी कराने आए थे। इसके बाद उन्होंने संबंधित अधिकारियों का ध्यान इस ओर दिलाया और आयोजकों से धार्मिक उत्सव को केवल मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं बनाने की अपील की।
विधायक ने अपने पोस्ट में यह भी कहा कि जिन लोगों की आस्था हिंदू धर्म और मां दुर्गा की उपासना से जुड़ी नहीं है, उन्हें ऐसे आयोजनों में शामिल करने या आयोजन की अनुमति देने पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने धार्मिक पहचान और पारिवारिक आस्था का हवाला देते हुए प्रशासन से पूछा कि ऐसे कार्यक्रमों का सामाजिक सद्भाव पर क्या असर पड़ सकता है। जमशेदपुर में यह विवाद नवरात्र के दौरान कई स्थानों पर डांडिया आयोजनों के प्रवेश द्वार पर पहचान पत्रों की जांच के बाद बढ़ा।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बिष्टुपुर के अम्यूजमेंट पार्क में एक कार्यक्रम के दौरान एक युवक के बताए गए नाम और पहचान पत्र में दर्ज नाम को लेकर विवाद हुआ था। इस दौरान कुछ देर के लिए अफरा-तफरी की स्थिति बनी। हिंदू उत्सव समिति और अन्य संगठनों ने आयोजनों में पहचान छिपाकर प्रवेश करने की आशंका जताते हुए जांच की मांग की थी। विवाद का दूसरा पहलू डांडिया आयोजनों के व्यावसायीकरण से जुड़ा है।
कुछ धार्मिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि पारंपरिक धार्मिक उत्सवों को डीजे और नाइट क्लब जैसी संस्कृति में बदला जा रहा है। संगठनों ने जिला प्रशासन से आयोजनों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने, पहचान पत्रों की जांच और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग भी की है। इस घटनाक्रम ने शहर में धार्मिक परंपराओं, सार्वजनिक सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी और सामाजिक सद्भाव को लेकर बहस तेज कर दी है।
एक ओर संगठन आयोजनों की धार्मिक मर्यादा और पहचान सत्यापन पर जोर दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी विवाद को बढ़ने से रोकने की चुनौती है।
