नई दिल्ली, 5 अगस्त (आईएएनएस)। मानसून सत्र के दौरान बुधवार को संसद में कावेरी जल विवाद और हिंदी थोपे जाने के मुद्दे पर डीएमके ने केंद्र और कर्नाटक सरकार पर तीखा हमला बोला। पार्टी सांसदों ने कहा कि तमिलनाडु के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा और सदन में जनता से जुड़े मुद्दे उठाए जाते रहेंगे।
डीएमके सांसद पी. विल्सन ने कावेरी जल संकट को लेकर कर्नाटक सरकार को घेरा। उन्होंने कहा, “2018 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद कर्नाटक सरकार ने कावेरी का पानी नहीं छोड़ा है। इसके अलावा, तमिलनाडु सरकार ने 7,000 क्यूसेक पानी छोड़ने के लिए सीडब्ल्यूआरसी का रुख किया है। असल में यह संकट के समय छोड़े जाने वाला पानी यानी डिस्ट्रेस रिलीज है। भले ही सीडब्ल्यूआरसी ने 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश दिया था और सीडब्ल्यूआरसी ने भी इसकी पुष्टि की थी, लेकिन कर्नाटक सरकार आज तक यह पानी नहीं छोड़ रही है। असल में, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने कल एक बहुत बड़ा आंदोलन किया था, और इसी वजह से उदयनिधि स्टालिन को झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया गया।”
डीएमके का कहना है कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के आदेशों का पालन न होने से तमिलनाडु के किसानों में नाराजगी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी कर्नाटक पानी रोक रहा है, जिससे तमिलनाडु में खेती और पीने के पानी पर असर पड़ रहा है। पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर सड़क से संसद तक विरोध का ऐलान किया है।
हिंदी थोपे जाने के मुद्दे पर भी पी. विल्सन ने सरकार पर निशाना साधा। टीवीके सरकार द्वारा रुपए के निशान की जगह “आरयू” का इस्तेमाल जारी रखने पर उन्होंने कहा, “तमिलनाडु में किसी भी रूप में हिंदी थोपे जाने को मंजूरी नहीं है। जब डीएमके सरकार सत्ता में थी, तो उसने रुपए के लिए ‘रुबाई’ या ‘आरयू’ शब्द का इस्तेमाल किया था क्योंकि तमिलनाडु में हिंदी से निकले शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता था।”
डीएमके सांसद तिरुचि शिवा ने सदन की कार्यवाही और विपक्ष की भूमिका पर बात की। उन्होंने कहा, “सरकार हमेशा यही खेल खेलती है, वे कभी हमारी मांगों को नहीं मानते, हमारे नोटिस का सम्मान नहीं करते और हमारी बात नहीं सुनते। वे सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित करते रहेंगे, लेकिन दोष हम पर मढ़ देंगे। सदन को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है। हमारे कुछ मुद्दे हैं, जिन्हें हम उठाएंगे। इसीलिए हम संसद आते हैं। जनता से जुड़े मुद्दों या किसी भी अहम मसले पर हम अपनी बात रखेंगे। उन्हें हमें जवाब देना चाहिए। अगर वे हमारी बात नहीं सुनते, तो हमें शोर मचाने पर मजबूर होना पड़ता है। फिर ऐसी तस्वीर पेश की जाती है, जैसे हम अनुशासनहीन या उग्र हैं।”

