नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं। कोई घर पर श्राद्ध करता है, तो कोई पवित्र नदियों के किनारे जाकर तर्पण और पिंडदान करता है। मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन भी ऐसी ही जगहों में शामिल है, जहां पितरों के लिए किए जाने वाले इन कर्मों की पुरानी परंपरा रही है।
महाकाल की नगरी के नाम से मशहूर उज्जैन सिर्फ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के लिए ही नहीं, बल्कि क्षिप्रा नदी के किनारे बसे कई तीर्थ स्थलों के कारण भी खास माना जाता है। इन्हीं में एक नाम है सिद्धवट, जहां श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।
उज्जैन शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित सिद्धवट को स्थानीय धार्मिक परंपरा में बेहद पवित्र स्थान माना जाता है।
उज्जैन जिला प्रशासन की वेबसाइट के मुताबिक, सिद्धवट को पापमोचन तीर्थ भी कहा जाता है। यहां मौजूद वट वृक्ष को लेकर मान्यता है कि इसे माता पार्वती ने लगाया था और इसकी पूजा भी की थी। इसी वजह से इस जगह का धार्मिक महत्व काफी पुराना है। यहां श्राद्ध, पिंड, तर्पण, पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इन कर्मों का यहां विशेष महत्व है।
पिंडदान में आम तौर पर पूर्वजों को याद करते हुए पिंड अर्पित किए जाते हैं और तर्पण के जरिए जल अर्पित किया जाता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान किए गए श्राद्ध और तर्पण से पूर्वजों को शांति और तृप्ति मिलती है।
उज्जैन में क्षिप्रा नदी, महाकालेश्वर और दूसरे प्राचीन तीर्थ स्थल एक ही धार्मिक परंपरा से जुड़े दिखाई देते हैं। यहां रामघाट का भी पिंडदान की परंपरा से जुड़ा एक लोकप्रिय धार्मिक संदर्भ है। कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने माता-पिता के लिए यहां पिंडदान किया था और इसी वजह से इस स्थान को रामघाट कहा गया।
पंचांग के अनुसार, 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध है, जबकि प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर को पड़ेगा। इसके बाद अलग-अलग तिथियों पर संबंधित श्राद्ध कर्म किए जाएंगे और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा।
