प्रयागराज, 1 नवंबर (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश में दीपावली से पहले कारीगर भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों को तैयार करने में जुटे हैं। इन मूर्तियों को प्राकृतिक मिट्टी और पानी में घुलने वाले रंगों से बनाया जा रहा है, जो पूरी तरह से इको-फ्रेंडली हैं। महिला मूर्तिकारों के अनुसार इन मूर्तियों की बाजार में जबरदस्त मांग है और प्रयागराज के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी खरीदार यहां पहुंच रहे हैं।
महिला मूर्तिकार अनामिका ने आईएएनएस से बातचीत में बताया कि वह जनवरी महीने से ही मूर्तियां बनाने का काम शुरू कर देती हैं। उन्होंने कहा कि यहां गणेश, लक्ष्मी, शुभ-लाभ, सरस्वती, गंगा और हनुमान जी सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती हैं। हर देवी-देवता की चार से पांच अलग-अलग वैरायटी उपलब्ध हैं, जो छोटे से लेकर बड़े आकार तक में बनाई जाती हैं।
अनामिका ने बताया कि इस काम में केवल घर के सदस्य ही नहीं बल्कि बाहर से भी कारीगरों को बुलाया जाता है। दीपावली नजदीक आते ही काम का दबाव बढ़ जाता है। त्योहार के करीब आने पर रोजाना 12 से 13 घंटे तक काम करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि मांग इतनी अधिक है कि वे पूरी तरह से आपूर्ति नहीं कर पाते। कई बार कच्चे माल और समय की कमी के कारण कई ग्राहकों को वापस भी करना पड़ता है। उनकी बनाई मूर्तियां प्रयागराज के अलावा अन्य जिलों और दूर-दराज के इलाकों में भी भेजी जाती हैं, लेकिन उत्पादन सीमित होने के कारण हर ऑर्डर पूरा नहीं हो पाता।
हानिकारक केमिकल के इस्तेमाल को लेकर पूछे गए सवाल पर अनामिका ने स्पष्ट किया कि मूर्तियों में किसी भी तरह के हानिकारक रसायन का प्रयोग नहीं किया जाता। रंगों को गोंद में मिलाकर तैयार किया जाता है, जो पूरी तरह से सुरक्षित हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते।
वहीं, दूसरी महिला मूर्तिकार रन्नू ने बताया कि यहां गणेश-लक्ष्मी के अलावा दुर्गा मैया, काली मैया, बजरंगबली, सरस्वती और कुबेर सहित उन सभी देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती हैं जिनकी पूजा दिवाली के अवसर पर की जाती है।
रन्नू के अनुसार उनकी मूर्तियों की मांग हर जगह है। कई व्यापारी यहां से मूर्तियां ले जाकर बेचते हैं और दूर-दूर तक इनकी आपूर्ति होती है। सभी मूर्तियों को हाथ से सजाया जाता है, जिससे हर मूर्ति का अपना अलग आकर्षण होता है।

