सरकार को सेना पर पूरा भरोसा, फौज को ऑपरेशन के दौरान दी जाती है पूरी छूट : मनोज मुकुंद नरवणे (आईएएनएस इंटरव्यू)

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गुरुग्राम, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत के पूर्व थल सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी नई किताब, सेना की भूमिका, चीन-पाकिस्तान, ऑपरेशन सिंदूर और वैश्विक सुरक्षा हालात पर अपनी राय रखी।

न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ इंटरव्यू में जनरल नरवणे ने ‘फोर स्टार डेस्टिनी’ को लेकर हुए विवाद पर खुलकर बात की। पेश हैं इंटरव्यू के प्रमुख अंश।

सवाल : आपकी पहली किताब फिक्शन पर आधारित थी, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया। अब आपकी नई किताब ‘द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ एंड मिस्ट्रीज’ नॉन-फिक्शन है। इस विषय पर लिखने का विचार कैसे आया?

जवाब : इस किताब में कुल 25 चैप्टर हैं और हर चैप्टर अपने आप में एक अलग कहानी है। इस किताब को लिखने का विचार मुझे तब आया, जब मैंने शशि थरूर की किताब ‘ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स: अराउंड द वर्ड इन 101 एसेज’ पढ़ी। यह किताब अंग्रेज़ी भाषा, शब्दों और उनके कॉन्सेप्ट्स पर आधारित है। उसे पढ़ने के बाद मेरे मन में आया कि क्यों न मैं भी ऐसी किताब लिखूं, लेकिन फौज से जुड़ी उन अनजानी और दिलचस्प बातों पर, जिनके बारे में आम लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं होती। बस वहीं से इस किताब की शुरुआत हुई।

सवाल : इस किताब में आपका सबसे पसंदीदा चैप्टर कौन सा है?

जवाब : मेरा सबसे पसंदीदा चैप्टर है ‘चक दे फट्टे’। यह मेरे रेजिमेंट का एक नारा भी है। चाहे खेल-कूद हो या एक-दूसरे का हौसला बढ़ाना हो, उस समय हम ‘चक दे फट्टे’ कहते हैं। आजकल यह शब्द काफी लोकप्रिय हो गया है। इस पर फिल्म भी बनी और आम लोग भी इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह शब्द आया कहां से है।

दरअसल, इसका इतिहास सिखों और मुगलों के बीच हुई लड़ाइयों से जुड़ा है। जब सिख सेना मुगलों के कैंप पर हमला करती थी, तो वापसी के समय रास्ते में बने लकड़ी के पुलों के फट्टे उखाड़ लेती थी। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि मुगल सेना उनका पीछा न कर सके। इसी दौरान वे एक-दूसरे से कहते थे, “चक दे फट्टे,” यानी काम पूरा हो गया। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मेरी किताब के सभी चैप्टर इसी तरह के फौजी इतिहास से जुड़े हैं।

सवाल : आपकी किताब ‘फोर स्टार डेस्टिनी’ प्रकाशित नहीं हुई, लेकिन वह विवादों में आ गई। राहुल गांधी उसे संसद में लेकर आए। क्या आप मानते हैं कि वह किताब प्रमाणिक थी?

जवाब : एक लेखक के तौर पर मैं यही कहूंगा कि मैंने उस किताब की फाइनल कॉपी खुद नहीं देखी है। वह कौन सी किताब थी, कहां से आई, उसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। प्रकाशक ने भी साफ कहा है कि इस किताब की कोई कॉपी आधिकारिक रूप से सर्कुलेशन में नहीं है। ऐसे में जो भी बाहर आया, वह कहां से आया, इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता।

सवाल : उस किताब की एक लाइन, ‘जो उचित समझो, वो करो,’ पर काफी विवाद हुआ। क्या इस लाइन का गलत मतलब निकाला गया?

जवाब : फौज को ऑपरेशन के दौरान पूरी छूट दी जाती है। इसका मतलब यह होता है कि सरकार को सेना पर पूरा भरोसा है। इस बात को उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। लेकिन अगर कोई हर चीज को गलत तरीके से देखना चाहता है, जैसे कि (ग्लास आधा खाली है या आधा भरा), तो फिर मैं क्या ही बोलूं।

सवाल : सेना के नाम पर राजनीति करने वालों को आप क्या कहना चाहेंगे? क्या इससे सेना का मनोबल प्रभावित होता है?

जवाब : मैं नहीं मानता कि सेना को राजनीति में लाया जा रहा है। भारतीय सेना और बाकी सशस्त्र बल पूरी तरह से गैर-राजनीतिक हैं। राजनीतिक नेतृत्व के आदेश का पालन करना सेना का कर्तव्य है। इसका मतलब यह नहीं है कि सेना राजनीतिक हो गई। जैसे अगर मैं अपने जूनियर को कोई आदेश देता हूं, तो उसका पालन करना उसका फर्ज है। उसी तरह, आर्मी चीफ के रूप में मेरा सीनियर रक्षा मंत्री होता है। अगर रक्षा मंत्री कोई आदेश देते हैं, तो सेना उसे मानती है। इसका यह मतलब नहीं कि सेना राजनीति में शामिल हो गई है। दोनों चीजों में स्पष्ट अंतर है।

सवाल : चीन सीमा पर भारतीय सेना ने चीनियों को कैसा जवाब दिया था? क्या भारत चीन को मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है?

जवाब : जब भी कोई सैन्य कार्रवाई होती है, तो वह पूरे देश का प्रयास होता है। यह सिर्फ सेना या किसी एक संगठन का काम नहीं होता। हमने एकजुट होकर कार्रवाई की, इसलिए हम सफल हुए। हमारी कार्रवाई के कारण ही पीएलए को पीछे हटना पड़ा। हमने चीन को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। अगर यह जीत नहीं है, तो और क्या है? और अगर लोग इसे भी स्वीकार नहीं करना चाहते, तो फिर मैं कुछ नहीं कह सकता।

सवाल : ऑपरेशन सिंदूर को एक साल होने वाला है। बतौर पूर्व सेना प्रमुख, आप इस ऑपरेशन और उसके बाद के हालात को कैसे देखते हैं?

जवाब : ऑपरेशन सिंदूर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। इस बार हमने सिर्फ आतंकवादी ठिकानों को निशाना नहीं बनाया, बल्कि उनके नेतृत्व के मुख्यालय को भी टार्गेट किया। यह पहले के ऑपरेशनों से अलग था। इसलिए रक्षा मंत्री ने भी कहा था कि हम ‘घर में घुसकर मारेंगे’। मुझे लगता है कि इससे पाकिस्तान को बहुत बड़ा संदेश मिला है कि अगर वह इस तरह की हरकत करेगा, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

सवाल : हर युद्ध से कुछ सीख मिलती है। ईरान-अमेरिका संघर्ष से भारतीय सेना ने क्या सीखा?

जवाब : हर युद्ध से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। असली सीख तब मिलती है जब युद्ध खत्म हो जाता है और हम उसका विश्लेषण करते हैं। लेकिन अभी जो स्थिति चल रही है, उससे एक बात साफ है कि हमें आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। यह आत्मनिर्भरता हर क्षेत्र में होनी चाहिए, चाहे वह तेल हो या क्रिटिकल मिनरल्स। हर सेक्टर में हमें खुद पर निर्भर होना होगा।

सवाल : पाकिस्तान अक्सर वैश्विक तनाव का फायदा उठाने की कोशिश करता है। आप इस प्रवृत्ति को कैसे देखते हैं?

जवाब : यह कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान पहले भी ऐसा करता रहा है। जब ‘ग्लोबल वॉर ऑन टेरर’ शुरू हुआ, तब पाकिस्तान ने खुद को उसमें शामिल कर लिया और अमेरिका का साथ दिया। उससे पहले, जब रूस ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया था, तब भी पाकिस्तान ने खुद को फ्रंटलाइन स्टेट बनाकर अमेरिका की मदद की थी। इसलिए यह उसकी पुरानी रणनीति है। लेकिन अगर इसके लंबे समय के प्रभाव को देखें, तो वह हमेशा नकारात्मक ही रहा है।