Friday, August 7, 2026
SGSU Advertisement
Home मनोरंजन ‘तमस’ से इतिहास के दर्द तक… जब भीष्म साहनी ने कलम से...

‘तमस’ से इतिहास के दर्द तक… जब भीष्म साहनी ने कलम से बयां की विभाजन की वो सच्चाई

0
5

नई दिल्ली, 7 अगस्त (आईएएनएस)। कुछ घटनाएं सिर्फ इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं होतीं बल्कि पीढ़ियों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ जाती हैं। भारत-पाकिस्तान का विभाजन भी ऐसी ही एक त्रासदी थी। साल 1947 में हुए बंटवारे ने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी। किसी ने अपना घर खोया, किसी ने अपना परिवार, तो किसी ने अपना सब कुछ पीछे छोड़कर अनजान जगह की ओर कदम बढ़ाया। इसी दर्द को साहित्य की दुनिया में बेहद गहराई से उतारने वाले लेखक थे भीष्म साहनी और उनकी सबसे चर्चित रचना रही ‘तमस’।

8 अगस्त 1915 को अविभाजित भारत के रावलपिंडी में जन्मे भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के उन लेखकों में गिने जाते हैं, जिन्होंने समाज को सिर्फ दूर से नहीं देखा, बल्कि उसके संघर्षों और दर्द को करीब से महसूस किया। वह प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अध्यापन, पत्रकारिता, अनुवाद और रंगमंच जैसे कई क्षेत्रों में काम किया। लेकिन उनकी असली पहचान बनी उनकी लेखनी से।

भीष्म साहनी का लेखन हमेशा आम आदमी की जिंदगी के आसपास घूमता रहा। उनके लिए साहित्य सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं था, बल्कि समाज की सच्चाई दिखाने का माध्यम था। वह मानवीय मूल्यों को सबसे ऊपर रखते थे। शायद यही वजह है कि जब उन्होंने विभाजन की त्रासदी पर ‘तमस’ लिखा, तो यह सिर्फ एक उपन्यास नहीं रहा, बल्कि उस दौर की एक जीवंत तस्वीर बन गया।

‘तमस’ में विभाजन के समय फैली सांप्रदायिक हिंसा को बेहद करीब से दिखाया गया है। कहानी की शुरुआत एक छोटी-सी घटना से होती है, लेकिन देखते ही देखते वही घटना पूरे शहर में तनाव और दंगे की वजह बन जाती है। नत्थू नाम के एक गरीब व्यक्ति से सूअर मरवाया जाता है और उसके बाद हालात तेजी से बिगड़ते चले जाते हैं। इसके बाद कहानी बताती है कि कैसे अफवाहें, राजनीति, धार्मिक कट्टरता और स्वार्थ आम लोगों की जिंदगी को तबाह कर देते हैं।

इस कहानी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि भीष्म साहनी ने किसी एक समुदाय को सिर्फ दोषी ठहराने की कोशिश नहीं की। उन्होंने दिखाया कि दंगों की आग में सबसे ज्यादा नुकसान आम इंसान का होता है। जो लोग कल तक पड़ोसी थे, अचानक एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। घर जलते हैं, रिश्ते टूटते हैं और इंसानियत सबसे बड़ी कीमत चुकाती है।

‘तमस’ की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि इस पर टेलीविजन के लिए भी फिल्म बनाई गई। गोविंद निहलानी के निर्देशन में बनी ‘तमस’ में ओम पुरी, अमरीश पुरी, दीप्ति नवल, दीना पाठक, ए.के. हंगल और खुद भीष्म साहनी जैसे कलाकार नजर आए। फिल्म और टेलीविजन प्रस्तुति ने विभाजन की उस भयावह तस्वीर को दर्शकों के सामने रखा, जिसे देखना आसान नहीं था।

‘तमस’ के प्रसारण को लेकर विवाद भी हुआ। सांप्रदायिक हिंसा के चित्रण को लेकर इसके प्रसारण पर रोक लगाने की कोशिश हुई, लेकिन बाद में अदालत ने इसे दिखाने की अनुमति दी। इसे सांप्रदायिकता के खिलाफ एक महत्वपूर्ण रचना माना गया। यही वजह है कि ‘तमस’ सिर्फ साहित्य या सिनेमा का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक बहस का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

भीष्म साहनी को ‘तमस’ के लिए 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्हें कई बड़े सम्मान मिले, जिनमें पद्म भूषण भी शामिल है। उनकी रचनाओं में ‘बसंती’, ‘मय्यादास की माड़ी’, ‘झरोखे’, ‘कुंतो’ और ‘नीलू नीलिमा नीलोफर’ जैसे उपन्यास भी शामिल हैं। नाटक और कहानियों के क्षेत्र में भी उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा।

साहित्य के साथ भीष्म साहनी का रंगमंच से भी गहरा रिश्ता था। वह इप्टा से जुड़े और अभिनय तथा नाटक के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। कुछ समय उन्होंने मॉस्को में अनुवादक के रूप में काम किया और रूसी साहित्य की कई महत्वपूर्ण कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया।

11 जुलाई 2003 को दिल्ली में उनका निधन हो गया लेकिन उनकी कलम की आवाज आज भी जिंदा है। उनकी विचारधारा चाहे जो रही हो, लेकिन इंसानियत उनके लेखन के केंद्र में हमेशा रही। वह समाज में मौजूद गरीबी, असमानता, सांप्रदायिकता, शोषण और राजनीतिक स्वार्थ पर खुलकर लिखते थे। उनकी भाषा सरल थी, लेकिन बात बेहद गहरी होती थी। यही वजह है कि उनका लिखा आज भी आम पाठक से सीधे जुड़ता है।