कानपुर, 14 सितंबर (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के सुरक्षित, जिम्मेदार और प्रभावी इस्तेमाल को लेकर राज्य स्तर पर नीति तैयार की जाएगी। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की पहल के बाद एआई पॉलिसी एडवाइजरी कमेटी का गठन किया गया है, जिसमें छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक को भी शामिल किया गया है। कमेटी का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में एआई के इस्तेमाल, नई तकनीकों, सेवाओं और भविष्य की रणनीति को लेकर स्पष्ट दिशा तय करना है।
प्रो. विनय कुमार पाठक ने आईएएनएस को बताया कि राज्यपाल की सोच है कि देश को आगे बढ़ाने में एआई और आधुनिक तकनीकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इसी उद्देश्य से नीति तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की टीम बनाई गई है। कमेटी में 4 लोग शामिल हैं। कमेटी अगले करीब तीन महीने में एआई नीति तैयार करने का प्रयास करेगी। इसके बाद विश्वविद्यालयों में एआई तकनीक के इस्तेमाल, संभावित सेवाओं और विभिन्न स्तरों पर इसके अनुप्रयोग को लेकर दिशा स्पष्ट की जा सकेगी।
प्रो. पाठक ने कहा कि अब रणनीति को केवल चर्चा तक सीमित रखने के बजाय ‘मंथन से मिशन’ की दिशा में ले जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सीएसजेएमयू में पहले से एआई के क्षेत्र में काम चल रहा है और अब इसे और तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा। विश्वविद्यालय में नए एआई टूल्स और कार्यक्रमों को विकसित करना लगातार चलने वाली प्रक्रिया होगी। जरूरत के मुताबिक नए प्रोग्राम और तकनीकी समाधान तैयार किए जाते रहेंगे।
एआई की पहुंच को ग्रामीण क्षेत्रों तक ले जाने के सवाल पर प्रो. पाठक ने कहा कि सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों में ‘एआई रेडीनेस’ तैयार करने की जरूरत है। उन्होंने विश्वविद्यालय के एआई हैकाथॉन का जिक्र करते हुए कहा कि इसके माध्यम से विद्यार्थियों को एआई आधारित समाधान विकसित करने के लिए तैयार किया जा रहा है। पहले विद्यार्थियों को एआई तकनीक का ज्ञान और प्रशिक्षण दिया जाए और इसके बाद वे स्थानीय जरूरतों के अनुसार मॉडल और सेवाएं विकसित करें। किसानों, गरीबों, मजदूरों और आम लोगों से सीधे जुड़े एआई टूल्स तैयार करने की कोशिश की जाएगी।
प्रो. पाठक ने बताया कि एआई का वास्तविक लाभ तभी व्यापक स्तर पर दिखाई देगा, जब तकनीक केवल बड़े शहरों और संस्थानों तक सीमित न रहकर समाज के विभिन्न वर्गों की समस्याओं के समाधान में इस्तेमाल हो।
एआई के फायदों और संभावित नुकसान को लेकर प्रो. पाठक ने कहा कि वर्तमान समय में एआई आवश्यकता बन चुका है। तकनीक को लेकर अनावश्यक डर की जरूरत नहीं है, लेकिन इसके इस्तेमाल में नैतिकता और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देना जरूरी है। एआई का उपयोग जिम्मेदारी और मूल्यों के साथ किया जाना चाहिए। किसी भी नई तकनीक के साथ उसके अच्छे और गलत इस्तेमाल की संभावनाएं रहती हैं, इसलिए तकनीक से डरने के बजाय उसके सुरक्षित और नैतिक इस्तेमाल की व्यवस्था बनाना अधिक महत्वपूर्ण है।
चुनावी प्रचार में एआई के बढ़ते इस्तेमाल और इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर प्रो. पाठक ने कहा कि नई तकनीक आने के साथ राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के माध्यम भी बदलते रहे हैं। पहले समाचार पत्र, फिर टेलीविजन, इंटरनेट, वीडियो और सोशल मीडिया जैसे माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ा और अब एआई भी इसी क्रम में शामिल हो रहा है। जैसे-जैसे तकनीक आधुनिक होती जाएगी, विमर्श और प्रचार में उसका इस्तेमाल भी बढ़ेगा। उन्होंने संभावना जताई कि भविष्य में डिजिटल टूल्स के जरिए किसी व्यक्ति के नाम या पहचान का इस्तेमाल करते हुए सामग्री तैयार की जा सकती है। ऐसे में एआई के जिम्मेदार इस्तेमाल और जागरूकता की आवश्यकता बढ़ जाती है।
प्रो. विनय कुमार पाठक ने बताया कि एआई पॉलिसी एडवाइजरी कमेटी में चार सदस्य हैं और टीम करीब तीन महीने के भीतर नीति तैयार करने की कोशिश कर रही है। नीति में विश्वविद्यालयों में एआई के इस्तेमाल, तकनीकी सेवाओं, विद्यार्थियों की तैयारी और समाज से जुड़े एआई समाधानों जैसे विषयों को शामिल किए जाने की दिशा में काम किया जाएगा।
उन्होंने आगे कहा कि एआई को लेकर विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल तकनीक अपनाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को ऐसी तकनीक विकसित करने के लिए भी तैयार करना चाहिए जिसका लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंच सके।
