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यूपी में एससी-एसटी आरक्षित विधानसभा सीटों के रोटेशन की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की

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नई दिल्ली, 4 नवंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों के रोटेशन की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि आरक्षित सीटों के रोटेशन का मुद्दा विधायिका और संसद के विचार करने का विषय है। इसके लिए याचिकाकर्ता को संसद में अपनी आवाज उठानी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि यह विरोध प्रदर्शन का अच्छा सीजन है और यह भी एक अच्छा मुद्दा है। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा, ”आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं। अपनी आवाज उठाइए कि विधायिका और संसद इस मुद्दे पर फिर से विचार करें।”

यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता जगदीश सिंह ने दाखिल की थी। याचिका में कहा गया था कि कादीपुर विधानसभा सीट करीब छह दशक से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) के तहत उन क्षेत्रों में सीटें आरक्षित की जाती हैं, जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी अधिक होती है।

याचिका में कहा गया था कि यदि कोई विधानसभा सीट दशकों तक आरक्षित रहती है तो सामान्य वर्ग के मतदाताओं के पास अपने वर्ग के उम्मीदवार को चुनने का विकल्प नहीं बचता। याचिकाकर्ता ने पंचायत और नगरपालिका चुनावों की तर्ज पर विधानसभा चुनावों में भी आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था लागू करने की मांग की थी।

इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी जून में याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में आरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित की गई है, लेकिन सीटों के रोटेशन को अनिवार्य नहीं बनाया गया है। यह विषय संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि दशकों तक किसी सीट के आरक्षित रहने से मतदाताओं का वोट देने का अधिकार कैसे छिन जाता है? क्या इससे जातिगत विभाजन बढ़ता है? पीठ ने कहा कि इन पहलुओं पर विचार करना संसद का काम है। केवल इस आधार पर संबंधित कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।

पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में आरक्षित सीटों की संख्या का प्रावधान है, जबकि परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(सी) सीटों की पहचान करने की प्रक्रिया बताती है। अदालत ने कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचे के अभाव में वह परिसीमन आयोग को आरक्षित सीटों के रोटेशन का निर्देश नहीं दे सकती। इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।