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विकसित भारत के लिए राज्यों की आर्थिक क्षमता मजबूत करना आवश्यक: वित्त राज्यमंत्री आशीष जायसवाल

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नई दिल्ली, 20 सितंबर (आईएएनएस)। ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश के आर्थिक विकास के साथ-साथ राज्यों की आर्थिक क्षमता को मजबूत करना आवश्यक है। राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए विकास की गति तेज करने तथा राज्यों की उत्पादन, पर्यटन, व्यापार और कृषि क्षमताओं को राष्ट्रीय एवं वैश्विक बाजारों से प्रभावी ढंग से जोड़ने की आवश्यकता है। यह बात महाराष्ट्र के वित्त राज्यमंत्री अधिवक्ता आशीष जायसवाल ने नई दिल्ली में कही।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय की ओर से 18 और 19 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ‘फाइनेंसिंग इंडियाज जर्नी टुवर्ड्स विकसित भारत’ विषय पर राज्यों के वित्त मंत्रियों और वित्त सचिवों का दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया गया। महाराष्ट्र सरकार की ओर से वित्त राज्यमंत्री अधिवक्ता आशीष जायसवाल, अपर मुख्य सचिव (वित्त) विकास चंद्र रस्तोगी और सचिव (वित्तीय सुधार) विजय वाघमारे ने सम्मेलन में भाग लिया।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दोनों दिन सम्मेलन में उपस्थित रहीं। इस दौरान केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय तथा विकास संबंधी समन्वय को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से विभिन्न विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए जायसवाल ने राज्य स्तर पर व्यापार एवं वाणिज्य क्षेत्र के लिए अधिक प्रभावी और सक्षम संस्थागत व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि देश के निर्यात में राज्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उत्पादन, उद्योग, प्रसंस्करण, बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और विभिन्न अनुमतियों के लिए उद्योगों तथा निर्यातकों को बड़े पैमाने पर राज्य सरकारों के साथ समन्वय करना पड़ता है। ऐसे में राज्यों में व्यापार एवं वाणिज्य के लिए एक निश्चित और सक्षम संस्थागत तंत्र उपलब्ध होने से उद्योगों तथा निर्यातकों को राज्य सरकार के साथ सीधे समन्वय करने में सुविधा होगी।

जायसवाल ने कहा, ”राज्यों की आर्थिक प्रगति के बिना देश की आर्थिक प्रगति को अपेक्षित गति नहीं मिल सकती। इसलिए राज्यों की उत्पादन और निर्यात क्षमता को राष्ट्रीय विकास से प्रभावी रूप से जोड़ा जाना चाहिए।”

जायसवाल ने पर्यटन को देश के विकास के लिए एक प्रमुख ‘ग्रोथ सेक्टर’ बताते हुए कहा कि पर्यटन स्थलों के विकास, बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और पर्यटकों के लिए स्थानीय सुविधाओं के निर्माण में राज्य सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उन्होंने कहा कि विश्व के कई देशों ने विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए योजनाबद्ध प्रयास कर पर्यटन को अपनी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। भारत के विभिन्न राज्यों में मौजूद विशाल पर्यटन क्षमता को देखते हुए विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्यों के समन्वय से अधिक प्रभावी नीति तैयार करने की आवश्यकता है।

कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के साथ उत्पाद के लिए सुनिश्चित बाजार उपलब्ध होना भी जरूरी है। इसी संदर्भ में जायसवाल ने महाराष्ट्र में सामने लाई गई ‘एसेट क्रॉप-लायबिलिटी क्रॉप’ अवधारणा को सम्मेलन में प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि यदि किसी फसल का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, लेकिन उसके अनुरूप बाजार उपलब्ध नहीं होता, तो किसानों को अपेक्षित मूल्य नहीं मिल पाता। साथ ही उस उपज की खरीद, भंडारण और प्रबंधन पर सरकार को भी बड़ा वित्तीय भार उठाना पड़ता है। इससे किसान की मेहनत और सरकारी खर्च, दोनों का अपेक्षित आर्थिक परिणाम सामने नहीं आ पाता।

इसीलिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग तथा निर्यात क्षमता रखने वाली फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित करते हुए फसल विविधीकरण की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

जायसवाल ने सुझाव दिया कि प्रत्येक जिले की जलवायु, मिट्टी, पानी की उपलब्धता, मौजूदा फसल पद्धति और बाजार मांग को ध्यान में रखकर जिलावार निर्यात क्षमता वाली फसलों की पहचान की जानी चाहिए।

किसानों और सरकार, दोनों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी फसलों को ‘एसेट क्रॉप’ के रूप में बढ़ावा दिया जाए, जबकि लगातार अधिक उत्पादन, कम बाजार मूल्य और सरकारी खरीद व भंडारण पर अतिरिक्त भार पैदा करने वाली फसलों को ‘लायबिलिटी क्रॉप’ के दृष्टिकोण से देखते हुए उनमें विविधीकरण की रणनीति अपनाई जाए।

जायसवाल ने कहा कि कृषि के भविष्य की दिशा ‘उत्पादन के बाद बाजार तलाशने’ के बजाय ‘बाजार और निर्यात मांग को ध्यान में रखकर उत्पादन की योजना बनाने’ की होनी चाहिए।

जायसवाल ने निर्यात योग्य कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने के लिए अलग डिजिटल पोर्टल तथा फसलवार एसओपी/एक्सपोर्ट पाथवे विकसित करने का भी सुझाव दिया।

इस व्यवस्था के माध्यम से किसानों, किसान उत्पादक संगठनों, प्रसंस्करण उद्योगों और निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय मांग, गुणवत्ता मानक, प्रमाणन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और निर्यात प्रक्रिया से संबंधित जानकारी एवं सुविधाएं एक ही मंच पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

उन्होंने कहा कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की तर्ज पर कृषि निर्यात के लिए सरल व्यवस्था विकसित होने से किसानों के उत्पादों को व्यापक बाजार मिल सकेगा। साथ ही अधिशेष कृषि उपज की सरकारी खरीद और भंडारण पर केंद्र तथा राज्य सरकारों का वित्तीय बोझ भी कम किया जा सकेगा।

सम्मेलन के दौरान वित्त राज्यमंत्री आशीष जायसवाल ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर महाराष्ट्र के वित्त, नियोजन और कृषि क्षेत्रों में लागू की जा रही विभिन्न अभिनव पहलों के साथ महत्वपूर्ण नीतिगत सुझावों पर विस्तृत चर्चा की।

जायसवाल ने केंद्रीय वित्त मंत्री को बताया कि महाराष्ट्र ने ‘विकसित महाराष्ट्र 2047’ का रोडमैप तैयार कर उसके क्रियान्वयन की शुरुआत कर दी है। बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाओं को लागू करते हुए भी राज्य ने राजकोषीय अनुशासन बनाए रखा है तथा विकास की गति और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है।

जायसवाल ने केंद्र सरकार की स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट (एसएएससीआई) योजना के अंतर्गत अभिनव और दीर्घकालीन प्रभाव वाली परियोजनाओं के लिए विशेष निधि आरक्षित करने का सुझाव दिया।

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी परियोजनाओं की प्रकृति को देखते हुए आवंटित राशि के उपयोग के लिए अधिक समय दिया जाना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने कृषि क्षेत्र के डिजिटल परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण एग्रीस्टैक के क्रियान्वयन में महाराष्ट्र की प्रगति के बारे में भी केंद्रीय वित्त मंत्री को जानकारी दी। केंद्रीय वित्त मंत्री से चर्चा में जायसवाल ने कृषि विभाग की योजनाओं का दृष्टिकोण ‘स्कीम-सेंट्रिक’ के बजाय ‘फार्म-सेंट्रिक’ बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि किसान को किसी उपलब्ध योजना में फिट करने के बजाय सबसे पहले उसकी खेती की वास्तविक आवश्यकता की पहचान की जानी चाहिए। किसान की जमीन, पानी की उपलब्धता, फसल पद्धति, जलवायु और स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन कर उसके अनुरूप विभिन्न कृषि योजनाओं का लाभ प्रदान किया जाना चाहिए।

इसके लिए राज्य में कृषि की वास्तविक स्थिति, भूमि, जल उपलब्धता, फसल पद्धति, उत्पादकता, बाजार और किसानों की जरूरतों को समझने के लिए व्यापक कृषि सर्वेक्षण की आवश्यकता भी उन्होंने रेखांकित की।

जायसवाल ने केंद्रीय वित्त मंत्री को ‘एसेट क्रॉप-लायबिलिटी क्रॉप’ अवधारणा और जिलावार निर्यात योग्य फसलों की पहचान कर कृषि उत्पादन को बाजार तथा निर्यात से जोड़ने के प्रस्ताव की भी जानकारी दी।

जायसवाल ने महाराष्ट्र में खेत मजदूरों के लिए उपलब्ध कराई जा रही सामाजिक सुरक्षा, महिला किसानों से संबंधित विधानमंडल में पारित विधेयकों तथा खेतों तक सड़क संपर्क मजबूत करने के लिए लागू योजनाओं की भी जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि खेतों तक पहुंचने वाली सड़कों को केवल ग्रामीण सड़क के रूप में नहीं, बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था के आवश्यक बुनियादी ढांचे के रूप में देखा जाना चाहिए। ऐसी सड़कें कृषि सामग्री खेत तक पहुंचाने, कृषि उत्पादों को बाजार तक ले जाने और समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

चर्चा के दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त राज्यमंत्री आशीष जायसवाल की ओर से प्रस्तुत अभिनव अवधारणाओं और सुझावों की सराहना की। केंद्रीय स्तर पर इन सुझावों पर नीतिगत दृष्टि से विचार किए जाने का आश्वासन भी दिया गया।

दो दिवसीय सम्मेलन में व्यापक आर्थिक स्थिति, सार्वजनिक वित्त को मजबूत बनाने, कृषि क्षेत्र के परिवर्तन के लिए वित्तपोषण, कृषि उत्पादों के विपणन, कटाई के बाद प्रबंधन, लॉजिस्टिक्स, बुनियादी ढांचा और खाद्य प्रसंस्करण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

इसके अलावा ऊर्जा परिवर्तन के लिए वित्तपोषण, अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और कार्बन क्रेडिट जैसे विषय भी चर्चा के केंद्र में रहे। विभिन्न राज्यों ने इन क्षेत्रों में अपने अनुभव और पहल साझा कीं।

महाराष्ट्र ने सम्मेलन में यह पक्ष रखा कि ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए राज्यों की आर्थिक क्षमता को मजबूत करना, राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना, वित्तपोषण में नवाचार करना और राज्यों की स्थानीय क्षमताओं को राष्ट्रीय तथा वैश्विक बाजारों से जोड़ना आवश्यक है।